
Premanand Ji Maharaj spiritual message (Source. Pinterest)
Naam Jap Kaliyug: जीवन की यात्रा में इंसान सुख-दुख दोनों से गुजरता है, लेकिन Shri Premanand Ji Maharaj का संदेश साफ और दृढ़ है “अपना दुःख-दर्द किसी को भी मत बताना!” उनका कहना है कि मनुष्य को वैसे ही जीना चाहिए, जैसे उसका इष्ट उसे रखे। हालात जैसे भी हों, संसार से मदद मांगने की आदत छोड़नी होगी। यह एक गांठ है, जिसे दिल में बांध लेना चाहिए। यदि अंत तक धैर्य न टूटे, तो यह निश्चित है कि हरि स्वयं सहायता के लिए आते हैं।
जब हम अपनी पीड़ा दुनिया के सामने रखते हैं, तो लोग बोझ बांटने नहीं, बल्कि कमजोरी का मज़ाक उड़ाने आते हैं। भूख, दर्द, परेशानी ये सब केवल प्रभु को बताने योग्य हैं, क्योंकि वही पहले से सब जानते हैं। हम अकसर उन बातों की चिंता करते हैं, जिनकी व्यवस्था प्रभु पहले ही कर चुके होते हैं। इसलिए चिंता छोड़कर भागवत चिंतन करना चाहिए जिसमें काल को भी कंपा देने की सामर्थ्य है।
भक्ति का रास्ता वीर योद्धाओं का है। एक बार कदम बढ़ा दिया, तो डगमगाना नहीं। लोग प्रशंसा करें या अपमान दोनों को सुनकर भी आगे बढ़ते रहना चाहिए, मस्त गजेंद्र की तरह, जिसे किसी की परवाह नहीं।
सच्चा वैराग्य यह समझना है कि सब कुछ ठाकुर जी का है घर, धन, परिवार। चाहे गृहस्थ हों या संन्यासी, स्वयं को मालिक नहीं, सेवक मानिए। ऐसा करने से मोक्ष सहज हो जाता है। साथ ही याद रखें, गुरु की आज्ञा का पालन ही सच्ची गुरु पूजा है; मिठाई या वस्त्र अर्पित करना केवल लौकिक व्यवहार है।
कलियुग में कर्म, मन और वातावरण की शुद्धता बनाए रखना कठिन है। इसलिए एकमात्र सहारा है नाम जप। नाम कल्पवृक्ष है, जो पतित से पतित आत्मा को भी संत बना सकता है।
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आध्यात्मिक उन्नति का पैमाना प्रभु पर अटूट विश्वास है। यदि प्रियाजू पर भरोसा न टूटे, तो दोषों के बावजूद ईश्वर-प्राप्ति संभव है। नाम के बिना सभी साधन अधूरे हैं। जीवन के अंत में निरंतर नाम न हो तो परिणाम शून्य है; नाम होने पर हर प्रयास अनंत मूल्य पा लेता है। हर श्वास के साथ “राधा” या “कृष्ण” का उच्चारण मोक्ष की शुरुआत है।
उदाहरण समझिए: नाम ‘1’ है और दान, व्रत, तप ‘0’। ‘1’ के बिना सारे ‘0’ बेकार हैं; ‘1’ जुड़ते ही मूल्य दस गुना बढ़ता जाता है।






