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Jagannath Temple : जगन्नाथ धाम के 56 भोग रहस्य का रहस्य! जानिए इसकी महिमा
- Written By: सीमा कुमारी
Jagannath Temple Prasad Mahima: जगन्नाथ धाम में भगवान जगन्नाथ को अर्पित किए जाने वाले 56 भोग का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना जाता है। इसके पीछे कई पौराणिक मान्यताएं और रोचक रहस्य है।

जगन्नाथ धाम (सौ.जैमिनी)
Jagannath Temple 56 Bhog Tradition: ओडिशा स्थिति जगन्नाथ धाम चार धाम में से एक है। हर साल ओडिशा के पुरी में स्थित जगन्नाथ धाम में रथ यात्रा का आयोजन किया जाता है। जगन्नाथ रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलराम के साथ बड़े बड़े रथों में सवार होकर जगन्नाथ मंदिर से गुडिचा मंदिर तक जाते हैं। इस साल 2026 में जगन्नाथ रथ यात्रा का आयोजन 16 जुलाई को किया जाएगा और 24 जुलाई तक यह उत्सव मनाया जाएगा।
मंदिर से जुड़ी कई मान्यताएं
जानकारों के अनुसार, जगन्नाथ धाम से जुड़ी कई ऐसी मान्यताएं हैं, जो सदियों से लोगों को आकर्षित करती रही हैं। इन्हीं में से एक है भगवान जगन्नाथ को अर्पित किया जाने वाला महाप्रसाद, जिसे श्रद्धालु बेहद पवित्र और दिव्य मानते हैं।
प्रतिदिन हजारों भक्त इस प्रसाद को ग्रहण करते हैं, लेकिन इसकी सबसे खास बात यह है कि इसे केवल भोजन नहीं, बल्कि भगवान का आशीर्वाद माना जाता है।
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महाप्रभु के छप्पन भोग की अनूठी परंपरा
पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर में भगवान को अर्पित किए जाने वाले छप्पन भोग का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व बेहद खास माना जाता है। मंदिर की विशाल रसोई में तैयार होने वाले इन व्यंजनों को मुख्य रूप से दो वर्गों में बांटा गया है-पके हुए भोजन और सूखे अथवा मिठाई वाले प्रसाद। सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ निभाई जाती है।
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पीठा और पारंपरिक मिठाइयां
श्री जगन्नाथ मंदिर में भगवान को अर्पित किए जाने वाले छप्पन भोग के अलावा,पीठा और पारंपरिक मिठाइयां भी शामिल होती हैं। पोड़ा पीठा, एंडुरी पीठा, आरिसा पीठा और काकरा पीठा जैसे व्यंजन ओडिशा की समृद्ध खाद्य संस्कृति की झलक दिखाते हैं।
नारियल, गुड़, चावल के आटे और सूजी से तैयार ये व्यंजन स्वाद और परंपरा का अद्भुत संगम माने जाते हैं। मालपुआ के स्थानीय रूप सना और बड़ा अमूलू भी महाप्रभु के प्रिय भोगों में गिने जाते हैं।
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सूखे प्रसाद
छप्पन भोग में कुछ ऐसे व्यंजन भी शामिल हैं जिन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। खाजा, गजा, मगाजा लड्डू और खुड़ुमा जैसे सूखे प्रसाद श्रद्धालुओं के बीच काफी लोकप्रिय हैं। इनमें खास तौर पर खाजा को जगन्नाथ महाप्रसाद की पहचान माना जाता है और देश-विदेश से आने वाले भक्त इसे अपने साथ लेकर जाते हैं।
आखिर महाप्रसाद को ‘अबाढ़ा’ क्यों कहा जाता है?
जगन्नाथ मंदिर की रसोई में तैयार भोजन को शुरुआत में सामान्य अन्न माना जाता है। लेकिन जब इसे भगवान जगन्नाथ को अर्पित करने के बाद माता विमला के समक्ष समर्पित किया जाता है, तब यह महाप्रसाद या ‘अबाढ़ा’ कहलाता है।
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‘अबाढ़ा’ शब्द का अर्थ है, ऐसा प्रसाद जिस पर किसी प्रकार का भेदभाव या प्रतिबंध लागू न हो। यही वजह है कि इस महाप्रसाद को जाति, वर्ग या सामाजिक स्थिति से ऊपर माना जाता है। मंदिर की परंपरा के अनुसार इसे कोई भी श्रद्धालु ग्रहण कर सकता है और यह कभी अशुद्ध नहीं माना जाता।
पौराणिक कथा से जुड़ा है अबाढ़ा का महत्व
मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ पहले नीलमाधव स्वरूप में शबर समुदाय के राजा बिश्वावसु द्वारा पूजे जाते थे। उनकी पूजा में किसी प्रकार का भेदभाव या जटिल नियम नहीं था। बाद में जब पुरी में भव्य मंदिर की स्थापना हुई, तब भी भगवान की इच्छा के अनुसार भोजन और प्रसाद वितरण की वही सरल और सर्वसमावेशी परंपरा जारी रखी गई। इसी भावना के कारण इस महाप्रसाद को ‘अबाढ़ा’ नाम मिला।
Jagannath temple 56 bhog mystery and significance
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