गुरु अपने शिष्यों को अपने ज्ञान और अटूट विश्वास से उत्कृष्ट बनाते है उतना ही इनके बिना जीवन की कल्पना करना भी आसान नहीं। प्राचीन काल से गुरू और शिष्य की जोड़ियां प्रसिद्ध है जिन्होंने सच्चे मन से एक-दूसरे के प्रति विश्वास बनाया। यहां अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला यानी गुरु ही शिष्य को जीवन में सफलता के लिए उचित मार्गदर्शन करता है।
गुरू-शिष्य की जोड़ियां (सौ. डिजाइन फोटो)
आज देशभर में गुरु पूर्णिमा का खास दिन है जो दुनिया के सभी गुरुओं के प्रति सम्मान व्यक्त करता है। जहां पर गुरु अपने शिष्यों को अपने ज्ञान और अटूट विश्वास से उत्कृष्ट बनाते है उतना ही इनके बिना जीवन की कल्पना करना भी आसान नहीं। प्राचीन काल से गुरू और शिष्य की जोड़ियां प्रसिद्ध है जिन्होंने सच्चे मन से एक-दूसरे के प्रति विश्वास बनाया। यहां अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला यानी गुरु ही शिष्य को जीवन में सफलता के लिए उचित मार्गदर्शन करता है।
बृहस्पति - दुनिया के पहले गुरु, देवताओं के गुरु बृहस्पति को मानते है। जो अपने रक्षोघ्र मंत्रों का प्रयोग कर देवताओं का पोषण और रक्षण भी करते हैं। असुरों के द्वारा मचाई गई तबाही से गुरु बृहस्पति रक्षा करते थे।
महर्षि वेदव्यास- प्राचीन काल से महर्षि वेदव्यास का नाम सुनते आ रहे है। कहा जाता है कि, वेदव्यास भगवान विष्णु के अवतार थे तो उनका नाम कृष्णद्वैपायन था। वेदों की रचना और विभाजन का ज्ञाता कहा जाता है। इसलिए इनका नाम वेदव्यास पड़ा। कहते हैं कि, सबसे बड़े पवित्र ग्रंथ महाभारत की रचना वेदव्यास ने की है।
गुरु सांदीपनि- गुरु पूर्णिमा पर भगवान श्रीकृष्ण के गुरु सांदीपनि का नाम आता है। उन्होंने भगवान श्री कृष्ण 64 कलाओं में पारंगत किया था। बताया जाता है कि, श्रीकृष्ण और बलराम इनसे शिक्षा प्राप्त करने मथुरा से उज्जयिनी ( उज्जैन) आए थे।
ब्रह्मर्षि विश्वामित्र- गुरु की बात करे तो, भगवान श्रीराम को अनेक दिव्यास्त्र प्रदान करने वाले गुरू विश्वामित्र रहे है।विश्वामित्र वैसे तो क्षत्रिय थे, लेकिन वह ब्रह्मा के बहुत बड़े भक्त थे। उन्होंने घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ब्रह्मा ने इन्हें ब्रह्मर्षि का पद प्रदान किया था। बताया जाता है कि भगवान राम को सीता स्वयंवर में ऋषि विश्वामित्र ही लेकर गए थे।
शुक्राचार्य -गुरू की बात की जाए तो, देवताओं के अलावा असुरों के भी गुरु होते थे। असुरों के गुरु, शुक्राचार्य को कहा गया है जो भृगु ऋषि तथा हिरण्यकशिपु की पुत्री दिव्या के पुत्र हैं। इनका जन्म का नाम शुक्र उशनस है। उनके पास एक शक्ति थी जिसके बल पर वह मृत दैत्यों को भी जीवित कर दिया करते थे जो उन्हें भगवान शिव ने दिया था। इस ज्ञान को मृत संजीवन विद्या का ज्ञान कहते हैं।
वशिष्ठ ऋषि - भगवान श्रीराम के कुल यानि सूर्यवंश के कुलगुरु थे। भगवान राम ने सारी वेद-वेदांगों की शिक्षा वशिष्ठ ऋषि से ही प्राप्त की थी। बताया जाता है कि, श्रीराम के वनवास से लौटने के बाद इन्हीं के द्वारा उनका राज्याभिषेक हुआ और रामराज्य का विस्तार हुआ।
परशुराम- इनका नाम महान गुरुओं में गिना जाता है जो भगवान विष्णु के अंशावतार थे। इन्होंने भगवान शिव से अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा प्राप्त की थी। परशुराम , गुरू होने के साथ ही महान योद्धा रहे है। पिता की हत्या का बदला लेने के लिए इन्होंने कई बार क्षत्रियों पर हमला किया और उनका मकसद धरती को क्षत्रिय विहीन कर देना था। बताया जाता है कि, पिता की हत्या का बदला लेने के लिए इन्होंने कई बार क्षत्रियों पर हमला किया और उनका मकसद धरती को क्षत्रिय विहीन कर देना था।
द्रोणाचार्य - महान गुरुओं में इनका नाम शामिल है। कौरवों और पांडवों को अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा देने वाले महान धनुर्धर थे। द्रोणाचार्य देवगुरु बृहस्पति के अंशावतार थे। इनके पिता का नाम महर्षि भरद्वाज था। महान धनुर्धर अर्जुन इनके प्रिय शिष्य थे और एकलव्य से इन्होंने गुरु दक्षिणा में अंगूठा ले लिया था।