सोयाबीन के कड़े मानक, पर अच्छा माल लाएं तो कहां से? किसानों का सरकार से सवाल

Soybean Farming Issues: सरकार के सख्त सोयाबीन गुणवत्ता मानकों को लेकर किसानों में नाराज़गी बढ़ी है। मौसम की मार से उत्पादन प्रभावित, खरीदी में आ रही कठिनाइयों पर सवाल उठा है।
सोयाबीन के कड़े मानक; पर अच्छा माल लाएँ तो कहाँ से?
सोयाबीन के कड़े मानक; पर अच्छा माल लाएँ तो कहाँ से? (सौजन्यः सोशल मीडिया)
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NAFED Procurement Rules: “सरकार को चाहिए नंबर वन सोयाबीन, लेकिन उसे लाएं तो आखिर कहां से?” तालुके के किसानों का यह तीखा सवाल अब जोर पकड़ता दिखाई दे रहा है। सोयाबीन खरीद के लिए शासन ने जो गुणवत्ता मानक तय किए हैं, वे इतने सख्त हैं कि मौसम की मार झेलकर तैयार हुआ अधिकतर उत्पादन इन दायरों में फिट ही नहीं बैठ रहा। किसानों का कहना है कि कागज़ों पर बने ये “आदर्श मानक” ज़मीन की वास्तविक स्थिति से बिल्कुल मेल नहीं खाते।

किसानों का आरोप है कि सरकार के कठोर नियमों के कारण, उत्पादन होते हुए भी खरीदी के दरवाज़े बंद नज़र आ रहे हैं। “सरकार के नियम आसमान में, और हमारी खेती ज़मीन पर,” ऐसे शब्दों में किसानों ने अपना गुस्सा व्यक्त किया। उनका कहना है कि अवास्तविक मानकों के नाम पर किसानों और खरीदी केंद्रों को जानबूझकर मुश्किल में डाला जा रहा है।

किसानों को थोड़ी राहत मिल सके'

शासन ने खरीदी के लिए परकीय पदार्थ, अपक्व व चिमटे दाने, किड़ी लगे दाने तथा नमी के लिए कड़े प्रतिबंध तय किए हैं। नाफेड केंद्रों को इन्हीं मानकों के आधार पर माल स्वीकार करने के निर्देश दिए गए हैं। मगर लगातार बदलते मौसम, परती बारिश, कीट-रोग के प्रकोप और आद्र्रता बढ़ने से ज्यादातर किसानों के दाने स्वाभाविक रूप से इन सीमाओं में नहीं आ पा रहे हैं। इन परिस्थितियों को देखते हुए किसानों ने शासन से मांग की है कि जमीन की हकीकत समझते हुए गुणवत्ता मानक तुरंत शिथिल किए जाएँ और खरीदी प्रक्रिया सुगम की जाए, ताकि मुश्किलों से जूझ रहे किसानों को थोड़ी राहत मिल सके।

‘बेदाग सोयाबीन’ कहाँ से लाएँ…

किसान सवाल उठा रहे हैं “लगातार बारिश से दाने काले पड़ गए, नमी बढ़ गई, कीट का प्रहार हुआ… यही खेती की सच्चाई है। ऐसे में सरकार जिस ‘बेदाग सोयाबीन’ की मांग कर रही है, वह मिलेगा कहाँ? और क्यों हर बार नुकसान सिर्फ किसान ही झेले?”

निकष सख्त हैं, लेकिन सुविधाएँ कमज़ोर

उधर कई नाफेड केंद्रों पर ग्रेडर उपलब्ध न होने, छंटाई में देरी और खरीदी प्रक्रिया ठप रहने की शिकायतें भी बढ़ रही हैं। किसानों में नाराज़गी इस बात को लेकर भी है कि निकष सख्त हैं, लेकिन सुविधाएँ बेहद कमज़ोर।

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