
उद्धव ठाकरे (सोर्स: सोशल मीडिया)
Uddhav Thackeray MLC Seat: महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है क्योंकि शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे की विधान परिषद (MLC) सदस्यता पर तलवार लटकती नजर आ रही है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, उद्धव ठाकरे का मौजूदा कार्यकाल 13 मई 2026 को समाप्त होने वाला है। राज्य के मौजूदा राजनीतिक समीकरणों और विधानसभा में पक्षीय संख्या बल को देखते हुए, ठाकरे के लिए दोबारा सदन में पहुंचना एक बड़ी चुनौती बन गया है।
विधान परिषद की एक सीट जीतने के लिए किसी भी उम्मीदवार को सदन में लगभग 29 से 30 मतों के कोटे की आवश्यकता होती है। हालांकि, शिवसेना (ठाकरे गुट) की वर्तमान स्थिति चिंताजनक है क्योंकि उनके पास विधानसभा में केवल 20 विधायक हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि उद्धव ठाकरे को अपनी सीट सुरक्षित करने के लिए कम से कम 10 अतिरिक्त वोटों की जरूरत होगी। यह समर्थन उन्हें केवल महाविकास अघाड़ी (MVA) के सहयोगियों कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) से ही मिल सकता है। लेकिन राज्यसभा और अन्य चुनावों को लेकर सहयोगियों के बीच चल रही खींचतान ठाकरे की राह में रोड़ा बन सकती है。
दूसरी ओर, सत्ताधारी महायुति गठबंधन (भाजपा, शिंदे सेना और अजित पवार गुट) इस समय बेहद मजबूत स्थिति में है। महायुति के पास 235 से 237 विधायकों का ठोस समर्थन है। इस संख्या बल के दम पर महायुति आसानी से अपने 7 उम्मीदवारों को विधान परिषद में चुनकर भेज सकती है। इसके विपरीत, महाविकास अघाड़ी के पास माकपा और शेकाप जैसे छोटे दलों को मिलाकर भी केवल 48 से 50 विधायकों का बल है, जो उनकी अपनी सीटें बचाने के लिए भी नाकाफी साबित हो सकता है।
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भाजपा और शिंदे गुट के नेताओं ने इस मुद्दे पर उद्धव ठाकरे को घेरना शुरू कर दिया है। भाजपा नेता और राज्यमंत्री पंकज भोयर ने तंज कसते हुए कहा कि कांग्रेस में समन्वय की कमी है और बिना उनके सहयोग के ठाकरे का दोबारा चुना जाना असंभव है। उन्होंने यह भी कहा कि महायुति की सफलता सरकार के विकास कार्यों की पावती है। वहीं, शिंदे गुट के नेता उदय सामंत ने भी तीखा हमला बोला है। उन्होंने स्पष्ट किया कि विधान परिषद का चुनाव पूरी तरह आंकड़ों का खेल है और हमारे पास 237 विधायक हैं। सामंत ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि जब आंकड़े सामने हों, तो किसी को भी व्यर्थ का “साहस” नहीं करना चाहिए।
अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा इस बात की है कि क्या उद्धव ठाकरे खुद चुनावी मैदान में उतरेंगे या पार्टी के किसी अन्य चेहरे को मौका देंगे। यदि वे खुद चुनाव लड़ते हैं, तो उन्हें कांग्रेस और शरद पवार को साधने के लिए बड़ी राजनीतिक सौदेबाजी करनी पड़ सकती है।






