
टेडी बियर (सौ. एआई)
Teddy Day History: वैलेंटाइन वीक के चौथे दिन यानी Teddy Day पर टेडी बियर गिफ्ट करने की होड़ मची है। लेकिन भारत में एक समय था जब शादियों के बाद या बचपन के खेल में गुड्डा-गुड़िया की परंपरा सबसे ऊपर थी। आज के दौर में टेडी ने इनकी जगह ले ली है पर इनके पीछे की कहानी और जज्बात बिल्कुल अलग हैं।
टेडी बियर आज रोमांस का ग्लोबल सिंबल है लेकिन भारतीय संस्कृति में खिलौनों का रिश्ता केवल मनोरंजन से नहीं बल्कि संस्कारों और लोक कथाओं से भी रहा है। आइए समझते हैं कि मिट्टी और कपड़े के गुड्डा-गुड़िया कैसे आज के Teddy से अलग हैं।
संस्कारों और विवाह का प्रतीक भारतीय परंपरा में गुड्डा-गुड़िया केवल खेलने की वस्तु नहीं थे। पुराने समय में बेटियों को विदाई के वक्त गुड्डा-गुड़िया दिए जाते थे ताकि उन्हें मायके की याद न सताए। कई राज्यों में आज भी गुड्डा-गुड़िया की शादी एक उत्सव की तरह मनाई जाती है जो बच्चों को भविष्य की सामाजिक जिम्मेदारियों और पारिवारिक ढांचे को समझने का एक खेल-खेल वाला तरीका था। ये अक्सर कपड़े की कतरनों या मिट्टी से बने होते थे जिनमें एक पर्सनल टच होता था। ये उस दौर के प्यार और रिश्तों की मजबूती को दर्शाते थे।
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एक अमेरिकी राष्ट्रपति से जुड़ी कहानी वहीं Teddy Bear की शुरुआत एक रोचक ऐतिहासिक घटना से हुई। साल 1902 में अमेरिका के राष्ट्रपति थियोडोर टेडी रूजवेल्ट एक शिकार पर गए थे जहां उन्होंने एक असहाय भालू को मारने से इनकार कर दिया। इस घटना पर एक कार्टूनिस्ट ने तस्वीर बनाई और न्यूयॉर्क के एक दुकानदार ने रूजवेल्ट के नाम पर टेडी बियर बनाया। तब से यह मासूमियत और सुरक्षा का प्रतीक बन गया।
जहां गुड्डा-गुड़िया परिवार और सामाजिक ढांचे का प्रतिनिधित्व करते थे वहीं टेडी बियर व्यक्तिगत प्रेम और केयर का प्रतीक है।
गुड्डा-गुड़िया मानवीय आकृतियां थीं जिनसे बच्चे घर-घर खेलते थे जबकि टेडी एक प्यारा सा पशु स्वरूप है जिसे कडल करना आसान है।
गुड्डा-गुड़िया की परंपरा सामूहिक खेल और त्योहारों से जुड़ी थी जबकि टेडी डे अब पूरी तरह से कपल ओरिएंटेड और कमर्शियल हो चुका है।
आज के समय में भले ही गुड्डा-गुड़िया लोक कलाओं और यादों के पिटारे तक सिमट गए हों लेकिन प्यार जताने का मूल भाव वही है। टेडी बियर उसी मासूमियत का आधुनिक अवतार है।






