पति दुर्योधन की मौत के बाद अर्जुन की पत्नी कैसे बनीं भानुमती? महाभारत का अनसुना रहस्य

Mahabharata Rahasya: युद्ध केवल सत्ता और सिंहासन की लड़ाई नहीं था, बल्कि यह रिश्तों के टूटने, बदलने और नए संबंधों के जन्म की भी कहानी है। इन में से एक कहानी भानुमती और अर्जुन के विवाह की भी है।
Bhanumati become Arjuna's wife after the death of her husband Duryodhana
Bhanumati Arjun Vivah (Source. Pinterest)
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Bhanumati Arjun Vivah: महाभारत का युद्ध केवल सत्ता और सिंहासन की लड़ाई नहीं था, बल्कि यह रिश्तों के टूटने, बदलने और नए संबंधों के जन्म की भी कहानी है। कुरुक्षेत्र में जहां कौरवों और पांडवों के बीच भयंकर रक्तपात हुआ, वहीं युद्ध के बाद कुछ ऐसे फैसले भी लिए गए, जिनका उल्लेख बहुत कम सुनने को मिलता है। इन्हीं रहस्यमयी घटनाओं में से एक है दुर्योधन की पत्नी भानुमती और अर्जुन का विवाह। आखिर पति की मृत्यु के बाद भानुमती ने अर्जुन को ही क्यों चुना, इसके पीछे की कथा बेहद रोचक और अर्थपूर्ण है।

कौन थीं भानुमती?

भानुमती काम्बोज देश के राजा चंद्रवर्मा की पुत्री थीं। वे केवल सुंदर ही नहीं, बल्कि बुद्धिमान, साहसी और युद्ध-कला में निपुण थीं। कहा जाता है कि वे कुश्ती और द्वंद्व युद्ध में इतनी दक्ष थीं कि कई बार दुर्योधन को भी पराजित कर देती थीं। दुर्योधन अपनी पत्नी के इसी साहस और व्यक्तित्व का बड़ा प्रशंसक था।

स्वयंवर से अपहरण तक की कहानी

मान्यताओं के अनुसार, भानुमती मन ही मन अर्जुन से प्रेम करती थीं और उन्हीं से विवाह करना चाहती थीं। जब राजा चंद्रवर्मा ने भानुमती का स्वयंवर रचा, तब किसी कारणवश अर्जुन वहां उपस्थित नहीं हो सके। इसी अवसर का लाभ उठाकर दुर्योधन ने कर्ण की सहायता से स्वयंवर के बीच से ही भानुमती का बलपूर्वक अपहरण कर लिया और उनसे विवाह कर लिया। इस दांपत्य से उन्हें दो संतानें हुईं पुत्र लक्ष्मण और पुत्री लक्ष्मणा।

पुत्री लक्ष्मणा और नियति का खेल

दिलचस्प बात यह है कि भानुमती की तरह ही उनकी पुत्री लक्ष्मणा के जीवन में भी अपहरण से विवाह की घटना घटी। दुर्योधन लक्ष्मणा का विवाह कर्ण के पुत्र से करना चाहता था, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब ने लक्ष्मणा का अपहरण कर उनसे विवाह कर लिया। इस तरह भानुमती का परिवार यदुवंश से भी जुड़ गया।

युद्ध के बाद अर्जुन से विवाह क्यों?

कुरुक्षेत्र युद्ध में दुर्योधन और उनके पुत्र लक्ष्मण की मृत्यु के बाद भानुमती के सामने अपने भविष्य और सुरक्षा का बड़ा प्रश्न खड़ा हो गया। कौरव वंश से जुड़ी होने के कारण उन्हें भय था कि आगे चलकर उनके परिवार के साथ अन्याय हो सकता है। ऐसे में भानुमती ने अर्जुन से विवाह का प्रस्ताव रखा, ताकि उनका परिवार पांडवों के संरक्षण में आ सके।

कहा जाता है कि यह सुझाव स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने दिया था, जिससे हस्तिनापुर में स्थायी शांति बनी रहे। भानुमती की यह दूरदर्शिता ही थी कि वे भविष्य में कौरव और पांडव वंश के बीच फिर किसी संघर्ष की संभावना नहीं चाहती थीं। इसी घटना से जुड़कर हिंदी का प्रसिद्ध मुहावरा प्रचलित हुआ "कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमती ने कुनबा जोड़ा"।

Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है। गुलमोहर मंच इसकी पुष्टि नहीं करता है।

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