

PCMC City Transformation Office Expense Project News: पिंपरी-चिंचवड़ महानगर पालिका (पीसीएमसी) आर्थिक संकट से जूझ रही है, लेकिन दूसरी ओर सलाहकारों पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं।
'सिटी ट्रांसफॉर्मेशन ऑफिस' (सीटीओ) नामक सलाहकार प्रणाली पर पिछले नौ वर्षों में 28 करोड़ 44 लाख रुपये खर्च किए गए, जबकि शहर की कई महत्वाकांक्षी परियोजनाएं अब भी अधूरी पड़ी हैं। इस कारण प्रशासन की कार्यशैली और प्राथमिकताओं पर सवाल उठने लगे हैं।
वर्ष 2017 में तत्कालीन आयुक्त श्रावण हर्डीकर के कार्यकाल में सीटीओ की अवधारणा लागू की गई थी। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञों की मदद से विकास परियोजनाओं को गति देना, उनकी निगरानी करना और गुणवत्ता सुधारना था। हालांकि भारी खर्च के बावजूद अपेक्षित परिणाम दिखाई नहीं दे रहे हैं। वर्तमान में एक निजी एजेंसी के करीब दस कर्मचारी मनपा में कार्यरत हैं, जिन पर हर महीने 25 से 30 लाख रुपये तक खर्च हो रहा है। कार्यालय, बिजली, इंटरनेट और अन्य सुविधाएं मनपा की ओर से मुफ्त उपलब्ध कराने के बावजूद अलग से भारी मानदेय दिया जा रहा है।
मनपा के लोक निर्माण, जलापूर्ति, विद्युत, स्वास्थ्य, शिक्षा और बीआरटी जैसे विभागों में पहले से ही विशेषज्ञ सलाहकार और परियोजना प्रबंधन कंपनियां कार्यरत हैं। ऐसे में समानांतर सीटीओ व्यवस्था की आवश्यकता पर प्रश्नचिन्ह खड़े हो रहे हैं। पवना बंद जलवाहिनी, भामा आसखेड जलापूर्ति योजना और 'पे एंड पार्क' जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाएं वर्षों से अधूरी हैं। कई विकास कार्यों की समय-सीमा बार-बार बढ़ाई गई, जबकि लागत लगातार बढ़ती रही। इसके कारण नागरिकों और करदाताओं में नाराजगी बढ़ रही है।
सीटीओ द्वारा तैयार किए गए शहर विकास प्रारूप की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि सीमित और त्रुटिपूर्ण सर्वेक्षण के आधार पर पूरे शहर के लिए अव्यावहारिक विकास योजना तैयार की गई। इसके साथ ही, सीटीओ पर हुए खर्च के आंकड़े भी चौंकाने वाले हैं। वर्ष 2017-18 में 1.45 करोड़ रुपये खर्च हुए थे, जो बाद के वर्षों में लगातार बढ़ते गए। वर्ष 2025-26 तक कुल खर्च 28.44 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।
सीटीओ को लेकर कई सवाल उठाए जा रहे हैं। प्रमुख सवाल यह है कि जब हर विभाग के पास अपने सलाहकार मौजूद हैं, तो अलग सीटीओ व्यवस्था की जरूरत क्यों है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय स्तर की महंगी सलाह से शहर को कितना वास्तविक लाभ हुआ, यह भी स्पष्ट नहीं हो पाया है।
करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद प्रमुख परियोजनाएं वर्षों से अधूरी क्यों है, इसे लेकर भी प्रशासन कटघरे में है। हालांकि मनपा के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि कर्मचारियों की कमी और आधुनिक तकनीकी जरूरतों को देखते हुए सीटीओ की सहायता ली जाती है।
विभिन्न परियोजनाओं की प्रस्तुति, डेटा संग्रह और राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए जरूरी दस्तावेज तैयार करने में सीटीओ की भूमिका महत्वपूर्ण है। प्रशासन का दावा है कि आधुनिक तकनीक और विशेषज्ञों के समन्वय से विकास कार्यों की गुणवत्ता सुधारने का प्रयास किया जा रहा है।
सामाजिक कार्यकर्ता मारुति भापकर ने कहा कि मनपा के पास पहले से ही आईएएस स्तर के अधिकारी, अभियंताओं की बड़ी टीम और मजबूत प्रशासनिक ढांचा मौजूद है। इसके चावजूद सीटीओ जैसी महंगी व्यकस्या पर करोड़ों रुपये खर्च करना पूरी तरह फिजूलखर्ची है।