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नासिक की जमीन पर 300 करोड़ की साजिश, 37 के खिलाफ FIR, जानें क्या है पूरा मामला
नासिक में बहुत बड़ी धोखधड़ी का पर्दाफाश हुआ है। नासिक में फर्जी दस्तावेजों के जरिए किए गए इस लेन-देन में ट्रस्टियों, खरीदारों और सहमति देने वालों सहित कुल 37 से अधिक लोगों के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला दर्ज हुआ।
- Written By: प्रिया जैस

नासिक में लैंड स्कैम (सौजन्य-सोशल मीडिया)
नासिक: पुलिस विभाग जिस जमीन पर 1990 से किराए पर है, वह जमीन उसकी मालिकी में न होते हुए भी नासिक डायोसेसन काउंसिल (एनडीसी) नामक संस्था द्वारा अवैध रूप से बेच दी गई इस चौंकाने वाले खुलासे ने पूरे शहर में खलबली मचा दी है। फर्जी दस्तावेजों के जरिए किए गए इस लेन-देन में ट्रस्टियों, खरीदारों और सहमति देने वालों सहित कुल 37 से अधिक लोगों के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला सरकारवाड़ा पुलिस स्टेशन में दर्ज किया गया है।
खास बात यह है कि फर्जी किरायानामा बनाकर पुलिस विभाग को भी ठगा गया है। असली जमीन नासिक डायोसेसन ट्रस्ट एसोसिएशन (एनडीटीए) की है, लेकिन एनडीसी ने नाम की समानता का दुरुपयोग करते हुए इसे बेच दिया ऐसा पुलिस द्वारा दर्ज शिकायत में कहा गया है। इस मामले में पुलिस विभाग ने स्वयं पहल करके शिकायत दर्ज की है, जिससे शहर के कई बड़े नामों की नींद उड़ गई है। इस पूरे प्रकरण में आडगांव पुलिस थाने के सहायक पुलिस निरीक्षक तुषार रतन देवरे ने शिकायत दर्ज कराई है।
उनके अनुसार, सरकार को करीब 300 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी का सामना करना पड़ा है। इस मामले में शहर के कुछ बड़े बिल्डरों और प्रभावशाली लोगों की संलिप्तता भी सामने आई है। संदिग्ध रूप से बेची गई यह जमीन नासिक के शरणपुर इलाके में सिग्नल के पास स्थित है, जहां वर्तमान में पुलिस उपायुक्त (जोन-1) का कार्यालय, एक निजी स्कूल और अन्य सरकारी कार्यालय हैं। यह जमीन 1990 से पुलिस विभाग के पास है।
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मूल जमीन किसकी थी?
असल में यह जमीन ‘एनडीसी’ की नहीं, बल्कि ‘नासिक डायोसेसन ट्रस्ट एसोसिएशन’ की है, जिसकी स्थापना 1913 के कंपनी अधिनियम के तहत 1943 में हुई थी। भारत की स्वतंत्रता के बाद, यह ट्रस्ट 1950 में मुंबई सार्वजनिक ट्रस्ट अधिनियम के अंतर्गत आया। इसके बाद, एनडीटीए के कुछ सदस्यों ने समान नाम से ‘एनडीसी’ नामक संस्था 13 जुलाई 1954 को पंजीकृत की, और जमीन को अवैध तरीके से अपने नाम कर लिया।
फर्जी दस्तावेजों से कैसे की गई बिक्री
एनडीटीए की जमीन को जानबूझकर एनडीसी की जमीन दिखाकर धर्मादाय आयुक्त कार्यालय में झूठे दस्तावेज प्रस्तुत किए गए, जिससे कि जमीन बिक्री की मंजूरी ली जा सके। इसके तहत 13 मार्च 2001 को पंजीकृत दस्तावेज क्रमांक 5044/2001 के अनुसार एक डेवलपर को जमीन बेची गई, जो कि पूरी तरह से अवैध था। इतना ही नहीं, मुंबई के धर्मादाय आयुक्त कार्यालय को भी भ्रमित कर यह अनुमति प्राप्त की गई, जबकि ऐसा करने के लिए स्थानीय धर्मादाय आयुक्त (नासिक विभाग) की अनुमति अनिवार्य होती है।
मामले की जांच जारी
पता चला है कि वर्ष 1996 में, जबकि जमीन पहले से पुलिस विभाग के कब्जे में थी, एनडीसी और हरियाली एग्रीकल्चर के बीच एक नोटरी एग्रीमेंट किया गया। तत्कालीन कीमत के मुकाबले जमीन को जानबूझकर मात्र 1.87 करोड़ रुपये में दर्शाया गया, जिससे न केवल राज्य को स्टाम्प ड्यूटी में भारी नुकसान हुआ, बल्कि यह भी साबित होता है कि लेन-देन पूरी तरह से फर्जी था।
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नगरभूमापन विभाग की 3 जून 2025 की रिपोर्ट में भी यह सामने आया है कि एनडीसी ने नाम की समानता और झूठे दस्तावेजों का इस्तेमाल करके सभी सरकारी कार्यालयों में एनडीटीए की संपत्ति को अपनी बताकर लाभ उठाने की कोशिश की। एनडीटीए की ओर से उप-पंजीयक कार्यालय में की गई शिकायत और भूमि मापन विभाग की विस्तृत रिपोर्ट के आधार पर अब उक्त भूखंड एनडीटीए के नाम दर्ज कर दिए गए हैं। इस आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है और जोन 1 के पुलिस उपायुक्त किरणकुमार चव्हाण ने बताया है कि मामले की विस्तृत जांच जारी है।
Conspiracy of rs 300 crore on nashik land scam fir against 37
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