

Khaparkheda Ash Dam Collapse: नागपुर जिले में एक दिन पहले हुई भारी बारिश के चलते खापरखेड़ा थर्मल पावर प्लांट से निकलने वाली फ्लाई ऐश (राख) की नांदगांव स्थित ऐश बांध में अवैज्ञानिक डंपिंग के कारण बांध टूट गया जिससे नांदगांव गांव के कृषि खेतों को भारी नुकसान पहुंचा। खेतों में राख बहने से किसानों की फसलें जलमग्न हो गईं।
इस संदर्भ में छपी खबर पर स्वयं संज्ञान लेते हुए हाई कोर्ट ने इसे जनहित याचिका के रूप में स्वीकार किया। साथ ही खबर को याचिका के रूप में प्रेषित करने तथा अदालत की मदद के लिए न्यायाधीश अनिल किलोर और न्यायाधीश राज वाकोडे ने अधि।
अर्णव पनसारे को अदालत मित्र के रूप में नियुक्त किया। हाई कोर्ट ने जिलाधिकारी को निर्देश दिया कि वे कार्रवाइयों का विवरण देते हुए अपना हलफनामा अदालत में प्रस्तुत करें।
नांदगांव का यह ऐश बांध पेंच नदी के बेहद करीब स्थित है। विशेषज्ञों का कहना है कि बारिश होने पर यह राख बहकर पेंच नदी में समा सकती है जिससे नदी का जल बुरी तरह प्रदूषित हो जाएगा।
प्रभावित किसानों के साथ खड़ी संस्था सीएफएसडी ने मांग की है कि पेंच नदी को भीषण प्रदूषण से बचाने और किसानों के नुकसान की भरपाई के लिए प्रशासन को महाजेनको के खिलाफ तत्काल सख्त कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए।
खबर के अनुसार महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीसीबी) ने महाजेनको को उत्पन्न होने वाली 100 प्रतिशत राख का उपयोग करने और खापरखेड़ा क्षेत्र में डंपिंग बंद करने के निर्देश दिए थे, एमपीसीबी के नियमों के अनुसार किसी भी ऐश बांध का उपयोग करने से पहले उसमें उचित लाइनिंग और लैगून बनाना अनिवार्य है।
कुछ लोगों के अनुसार महाजेनको 100% राख का उपयोग करने में विफल रहा और वारेगांव बांध फुल होने के कारण उसने बिना किसी लाइनिंग या लैगून के नांदगांव में खुले तौर पर राख फेंकना शुरू कर दिया।
समाचार पत्रों में छपी खबरों के अनुसार महाराष्ट्र स्टेट बिजली निर्माण कंपनी (महाजेनको) ने 1988 मैं नांदगांव में स्थानीय निवासियों से 723 एकड़ जमीन फ्लाई ऐश डंपिंग के लिए अधिग्रहित की थी। हालांकि लंबे समय तक इसका उपयोग नहीं किया गया और किसानों ने इस भूमि पर खेती शुरू कर दी थी।
वर्ष 2021 में जब वारेगांव ऐश बांध ओवरलोड हो गया तो महाजेनको ने पहली बार नांदगांव का इस्तेमाल किया। उस समय भी फसलों का नुकसान हुआ था। तब किसानों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं के भारी विरोध के बाद तत्कालीन राज्य के पर्यावरण मंत्री आदित्य ठाकरे ने डंपिंग पर रोक लगा दी थी लेकिन अब 5 साल बाद महाजेनको ने बिना किसी वैज्ञानिक प्रक्रिया का पालन किए फिर से यहां राख डालना शुरू कर दिया है जिससे यह हादसा हुआ।