Nagpur : दूषित पानी से ग्रामीणों का पलायन, नाग नदी प्रदूषण परियोजना ठप, हालात बदतर

Nag River Pollution नाग नदी प्रदूषण परियोजना वर्षों से बदलावों और धीमी गति के कारण अधूरी। दूषित पानी कई गांवों की जमीन, खेती व स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है, जिससे ग्रामीण पलायन को मजबूर हुए हैं।
नाग नदी प्रदूषण
प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स : सोशल मीडिया )
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Nag River pollution Hindi News: नाग नदी प्रदूषण उन्मूलन परियोजना को गति देने के लिए टाटा कंसल्टेंसी इंजीनियर्स लिमिटेड को परियोजना प्रबंधन सलाहकार के रूप में नियुक्त किया गया है। इस परियोजना को 5 पैकेज में विभाजित किया गया है और दूसरे पैकेज के तहत सेंट्रल सीवेज जोन की निविदा प्रक्रिया जारी है। हालांकि 2008 से अब तक इस परियोजना की रूपरेखा में कई बदलाव हुए हैं।

परियोजना ने अभी भी पूरी तरह से गति नहीं पकड़ी है जिसके कारण नाग नदी के किनारे के गांव दूषित पानी से उत्पन्न स्वास्थ्य समस्याओं से त्रस्त होकर नागरिकों द्वारा पलायन किए जाने के कारण उजड़ गए हैं। शहर के दूषित पानी ने स्वच्छ जीवन जीने वाले कई ग्रामीणों की खुशी छीन ली है।

ग्रामीण बताते हैं कि दूषित पानी कई गांवों तक पहुंच गया है जिससे यहां की खेती समृद्ध हुई है। हालांकि विहीरगांव, पांढुर्णा, खेड़ी, टेमसका, आडका जैसे गांवों के नागरिकों ने अब तक यह चिंता व्यक्त की है कि उनका स्वास्थ्य खतरे में पड़ गया है।

इन गांवों से यह नाला 31 किलोमीटर की दूरी तय करके शिवनी, झरप और भानेवाड़ा इन तीन गांवों की सीमा पर पोरा नदी के नाले से नाग नदी में मिल जाता है। दूषित पानी की इन 2 धाराओं के कारण शिवनी, झरप और भानेखेड़ा के नागरिकों का स्वास्थ्य दूषित पानी से खतरे में है। मानसून में नाग और पोरा नदी में महा-बाढ़ आने से यहां की लगभग सौ डेढ़ सौ एकड़ जमीन पानी में डूब जाती है।

कन्हान नदी को भी जकड़ा

शहर की गंदगी को बहाकर ले जाने वाली नाग नदी ने कुही तहसील के सावंगी (मोठी) में कन्हान नदी को भी जकड़ लिया है। परिणामस्वरूप संगम से पहले नाग नदी के किनारे के मोहगांव, चिचघाट और संगम के बाद कन्हान नदी भी दूषित हो गई है जिससे मोठी सावंगी, छोटी सावंगी और अगरगांव निवासियों की समस्याओं में इजाफा हुआ है। नागरिकों के शहर की ओर पलायन के कारण इन गांवों का अस्तित्व भी खतरे में आ गया है।

ककड़ी, ढेमस, खीरा की फसल नष्ट

नाग नदी की पूरी गंदगी कन्हान नदी में घुस जाती है। इसके कारण मोठी सावंगी, छोटी सावंगी और अगरगांव के नागरिकों को ढेमस, खरबूज और तरबूज जैसी नदी फसलों से हाथ धोना पड़ा है। नाग नदी के गदले पानी से खरबूज की खेती पूरी तरह नष्ट हो गई है। ढेमस और तरबूज की फसलें उगाना भी असंभव हो गया है।

मछली पकड़ना भी इतिहास बना : मछली पकड़कर अपना पेट भरने वालों की अर्थव्यवस्था भी बिगड़ गई है और यहां के कई लोग शहर की ओर चले गए हैं। ये गांव अब केवल नाम के लिए ही बचे हैं।

इन गांवों पर प्रदूषण की मार

विहीरगांव, पांढुर्णा, खेड़ी, टेमसका, आडका, नरसाला, पिपला, हुडकेश्वर, बेसा, बेलतरोडी, तरोडी, सावंगी (मोठी), मोहगांव, चिचघाट, छोटी सावंगी, शिवनी, झरप, भानेवाड़ा, चापेगड़ी, मोहगांव, चिचघाट, धामणी, पवनी, मसली, गोंडपिपरी, नवेगांव, सिरसी (नवेगांव), हरदोली, मालोदा, तुडका, अंभोरा, जीवनापुर, फेगड, खराडा, गोन्हा, सिरसी, नवेगांव, वेलतूर, राजोला, तितूर, कुचाडी, मोहाडी, आवरमारा, तारोली, ब्राम्हणी।

फाइलेरिया (हत्ती रोग) के मरीजों में वृद्धि

नाग नदी का 3 नदियों के संगम से विदर्भ के पवित्र तीर्थस्थल अंभोरा को भी झटका लगा है। अंभोरा सहित आसपास के 10 गांवों में पीलिया और फाइलेरिया के मरीजों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। इतना ही नहीं विभिन्न प्रकार के जलीय जीव-जंतुओं और दुर्लभ मछलियों का जीवन भी अल्पकाल का हो गया है।

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