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नागपुर हाई कोर्ट की बड़ी व्यवस्था: नौकरीपेशा पत्नी से घर खर्च में योगदान मांगना 498-A के तहत क्रूरता नहीं
- Written By: अंकिता पटेल
Nagpur High Court Judgment: HC ने कहा कि नौकरीपेशा पत्नी से घर खर्च में आर्थिक योगदान की अपेक्षा करना अपने आप में क्रूरता या अवैध धन मांग नहीं है। कोर्ट ने पति और ससुराल पक्ष के खिलाफ मामला रद्द किया।

हाई कोर्ट, वैवाहिक विवाद,(सोर्स: सोशल मीडिया)
Nagpur Family Law News: नागपुर हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवादों के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि नौकरीपेशा पत्नी से घर खर्च में आर्थिक योगदान की उम्मीद करना भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498-ए के तहत मानसिक या शारीरिक उत्पीड़न अथवा गैर कानूनी पैसे की मांग नहीं माना जा सकता। इसके बाद हाई कोर्ट ने पति और सास-ससुर के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने का आदेश भी दिया।
अभियोजन पक्ष के अनुसार मानकापुर निवासी एक दंपति ने प्रेम विवाह किया था और उनका एक बेटा भी है। सरकारी कर्मचारी पत्नी ने पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई थी कि उसके पति और ससुराल वालों द्वारा उसका उत्पीड़न किया जा रहा है। पत्नी का आरोप था कि उस पर अपना पूरा वेतन घर में जमा करने का दबाव बनाया जाता था। इसके अलावा उसने यह भी दावा किया कि उसे अपने देवर के खाते में 2।32 लाख रुपये ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया गया, प्रसूति का खर्च भी खुद उठाना पड़ा और डिलीवरी के बाद उसे मायके में छोड़ दिया गया।
ससुराल वालों की ओर से बैंक लेन-देन का रिकॉर्ड पेश
जब यह मामला अदालत में पहुंचा तो आरोपियों (पति और ससुराल वालों) की ओर से बैंक लेन-देन के रिकॉर्ड पेश किए गए। इन रिकॉर्ड्स से यह साबित हुआ कि पत्नी द्वारा दी गई 2.32 लाख रुपये की राशि का इस्तेमाल कोविड महामारी के दौरान बीमार पड़े पति के निजी अस्पताल में इलाज के लिए किया गया था। यही नहीं, रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट हुआ कि इलाज का यह खर्च बाद में पत्नी को वापस लौटा दिया गया था।
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अदालत ने बचाव पक्ष की इस दलील को स्वीकार किया कि इन सामान्य आर्थिक लेन-देनों को जानबूझकर उत्पीड़न का रूप दिया गया है। न्यायालय ने अपने फैसले में विशेष रूप से कहा कि चूंकि पत्नी एक सरकारी कर्मचारी है और यदि वह घर के कामों में हिस्सा नहीं लेती है तो उससे घर खर्च में कुछ आर्थिक जिम्मेदारी उठाने की उम्मीद करना अपने आप में कोई गैर कानूनी मांग या क्रूरता का कृत्य नहीं है। पैसों के इस लेन-देन के पीछे उत्पीड़न का कोई इरादा नहीं पाया गया।
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वाट्सएप पर धमकी भरे संदेश और विवाद
अदालत के संज्ञान में यह बात भी आई कि पति ने जब बच्चे के संरक्षण के लिए अदालत में याचिका दायर की थी, उसके बाद ही पत्नी ने उसे वाट्सएप पर धमकी भरे संदेश भेजे थे। अदालत ने यह भी कहा कि पुलिस में शिकायत भी इन घटनाओं के बाद ही दर्ज कराई गई थी। इन सभी परिस्थितियों और सबूतों पर विचार करने के बाद हाई कोर्ट ने पति, सास और ससुर के खिलाफ दर्ज की गई पूरी आपराधिक कार्रवाई (एफआईआर) को रद्द कर दिया। हालांकि अदालत ने मामले का निपटारा करते हुए आरोपियों को पब्लिक वेलफेयर फंड में 10,000 रुपये जमा करने का निर्देश भी दिया है।
High court judgment working wife household expenses not cruelty under 498a nagpur
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