BrahMos इंजीनियर बरी, पाकिस्तान जासूसी के शक में हुआ था अरेस्ट, जेल के पीछे किया MBA, कहा- अब नहीं..

BrahMos Engineer Acquitted: ब्रह्मोस इंजीनियर निशांत अग्रवाल 7 साल बाद बरी। जेल में रहते IIM लखनऊ से MBA पूरा किया। हाई कोर्ट ने कहा- गोपनीय जानकारी का कोई सबूत नहीं।
BrahMos Engineer Acquitted: ब्रह्मोस इंजीनियर निशांत अग्रवाल 7 साल बाद बरी। जेल में रहते IIM लखनऊ से MBA पूरा किया। हाई कोर्ट ने कहा- गोपनीय जानकारी का कोई सबूत नहीं।
निशांत अग्रवाल (सौजन्य-सोशल मीडिया)
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Nishant Agrawal News: ब्रह्मोस मिसाइल प्रोजेक्ट से जुड़े युवा इंजीनियर निशांत अग्रवाल की जिंदगी ने वो मोड़ लिया जिसका इंतजार उन्हें 7 साल तक जेल की सलाखों में करना पड़ा। पाकिस्तान के लिए जासूसी के आरोप में 2018 में गिरफ्तार किए गए निशांत को बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने बरी कर दिया।

अदालत ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई उम्र कैद की सजा को रद्द करते हुए कहा कि दुश्मन देशों को कोई गोपनीय जानकारी भेजे जाने का साफ-साफ सबूत रिकॉर्ड में नहीं है लेकिन इन 7 वर्षों ने उन्हें तोड़ा नहीं बल्कि नया गढ़ा। जेल में रहते हुए निशांत ने मास्टर डिग्री पूरी की, कविताएं लिखीं और विज्ञान से परे एक नई जिंदगी की तैयारी की।

रिहाई से ठीक पहले उन्होंने आईआईएम लखनऊ से एग्ज़ीक्यूटिव एमबीए पूरा किया। वे कहते हैं, ‘अब शोध की दुनिया में नहीं लौटूंगा। जिंदगी ने जो सिखाया है, उससे आगे बढ़ने के लिए तैयार हूं, मैं अब फुल मैराथन दौड़ने को तैयार हूं।’

केवल प्रक्रियाओं का उल्‍लंघन किया

निशांत अग्रवाल की गिरफ्तारी एक लिंकडिन चैट से शुरू हुई थी जो बाद में मैलवेयर से जुड़ी गतिविधि का हिस्सा पाई गई। जांच एजेंसियों ने उस चैट को पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी से जोड़ते हुए गंभीर आरोप लगाए थे लेकिन हाई कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि तकनीकी त्रुटियों और सुरक्षा प्रोटोकॉल के उल्लंघन से आगे बढ़कर ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि उन्होंने कोई संवेदनशील डेटा साझा किया हो।

कोर्ट ने यह भी माना कि निशांत की ओर से कुछ प्रक्रियात्मक चूक जरूर हुईं, पर ऐसे मामलों में अधिकतम सजा उतनी नहीं होती जितना वह पहले ही काट चुके थे। इसी आधार पर अदालत ने उन्हें तुरंत रिहा करने का आदेश दिया। उन्होंने 7 साल से ज्‍यादा समय जेल में बिताया जो कि संभावित अधिकतम सजा से भी अधिक था।

निशांत की कहानी उठाती है सिस्‍टम पर सवाल

उनका यह वाक्य सिर्फ खेल या करिअर का प्रतीक नहीं बल्कि 7 साल की मानसिक लड़ाई, अपनों से दूरी, सामाजिक कलंक और न्याय की लंबी प्रतीक्षा के बाद नये जीवन की शुरुआत का घोषणा-पत्र है। निशांत की कहानी एक बार फिर यह सवाल उठाती है कि देश की सुरक्षा से जुड़े मामलों की जांच जितनी संवेदनशील होती है उतनी ही जरूरी है कि आरोप और सबूत की परख भी कठोरता से हो। अदालत का फैसला न केवल उनकी बेगुनाही का प्रमाण बनकर सामने आया बल्कि यह भी दिखाता है कि न्याय देर से सही पर निर्णायक रूप में आता है, अगर तथ्यों के पक्ष में हो।

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