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खून, इल्ज़ाम और फिर जीत! पढ़िए कैसे एक मर्डर के बाद जीता शिवसेना का पहला विधायक
Balasaheb Thackeray Party First MLA: जानिए कैसे एक हत्याकांड ने बदली महाराष्ट्र की राजनीति। शिवसेना के पहले विधायक की जीत और बालासाहेब ठाकरे के उदय की पूरी कहानी।
- Written By: प्रिया जैस

ये तस्वीर साल 1970 की है, जिसमें शिवसेना के पहले विधायक वामनराव महादिक के साथ बाल ठाकरे नजर आ रहे हैं। (सौजन्य-सोशल मीडिया)
Balasaheb Thackeray Birth Anniversary: आज, 23 जनवरी को महाराष्ट्र की राजनीति के एक बड़े नेता बालासाहेब ठाकरे की जन्म शताब्दी है। बालासाहेब एक ऐसा नाम है, जिनका वर्णन किए बिना महाराष्ट्र की राजनीति का अधरी है। आज हम उनके बारे में एक कहानी शेयर करने जा रहे हैं, जिसमें बताया गया है कि उन्होंने महाराष्ट्र की राजनीति की दुनिया में अपने पहले कदम कैसे रखे।
महाराष्ट्र की राजनीति में बालासाहेब ठाकरे का नाम सिर्फ एक नेता के तौर पर नहीं, बल्कि एक आंदोलन के रूप में दर्ज है। शिवसेना की यह यात्रा आसान नहीं थी। इसका पहला बड़ा राजनीतिक मोड़ एक ऐसी घटना के बाद आया, जिसने पूरे राज्य को झकझोर दिया।
परेल की वो रात
साल 1967 के विधानसभा चुनाव में परेल सीट से क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता कृष्णा देसाई विधायक चुने गए थे। तेजतर्रार भाषण शैली और आक्रामक राजनीति के कारण वे जल्द ही मुंबई ही नहीं, पूरे महाराष्ट्र में चर्चित हो गए। लेकिन 5 जून 1970 की रात परेल के लालबाग इलाके में वह घटना घटी, जिसने महाराष्ट्र की राजनीति की दिशा बदल दी।
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उस रात कृष्णा देसाई लालबाग स्थित ललित राइस मिल में आम लोगों से मुलाकात कर रहे थे। बातचीत के दौरान कुछ लोगों ने उन्हें बहाने से बाहर बुलाया। इलाके की बिजली गुल थी और अंधेरे का फायदा उठाकर दो से तीन लोगों ने उन पर जानलेवा हमला कर दिया। मौके पर ही कृष्णा देसाई की मौत हो गई।
महाराष्ट्र में सियासी तूफान
इस हत्या ने राजनीतिक गलियारों में तूफान खड़ा कर दिया। उस समय आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हुआ और शिवसेना का नाम भी चर्चाओं में आया। हालांकि, बालासाहेब ठाकरे ने इस घटना की सार्वजनिक रूप से निंदा की थी। बावजूद इसके, माहौल पूरी तरह बदल चुका था।
कृष्णा देसाई की हत्या के बाद 18 अक्टूबर 1970 को परेल विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुआ। वामपंथी दलों ने उनकी पत्नी सरोजिनी देसाई को उम्मीदवार बनाया। कांग्रेस (आर) समेत कुल 13 वामपंथी दल उनके समर्थन में एकजुट हो गए। मुकाबला आसान नहीं था। इसके जवाब में शिवसेना ने अपने पार्षद और बालासाहेब ठाकरे के करीबी माने जाने वाले वामनराव महादिक को मैदान में उतारा। यह शिवसेना के लिए राजनीतिक अस्तित्व की परीक्षा थी।
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बालासाहेब ने खुद संभाला मोर्चा
चुनावी अभियान के दौरान बालासाहेब ठाकरे ने खुद मोर्चा संभाला। उन्होंने करीब 15 जनसभाएं कीं और अपनी आक्रामक शैली में वामपंथी राजनीति पर सीधा हमला बोला। भाषणों में राष्ट्रवाद, मराठी अस्मिता और मुंबई के सवाल केंद्र में रहे।
जब नतीजे आए, तो महाराष्ट्र की राजनीति ने इतिहास बनते देखा। वामनराव महादिक करीब 1600 वोटों से चुनाव जीत गए। शिवसेना की स्थापना के चार साल बाद पार्टी को अपना पहला विधायक मिला।
यह जीत सिर्फ एक सीट की नहीं थी। यह वह क्षण था, जब बालासाहेब ठाकरे की राजनीति सड़कों से विधानसभा तक पहुंची। एक राजनीतिक हत्या के बाद हुए इस उपचुनाव ने शिवसेना को नई पहचान दी और महाराष्ट्र की राजनीति में बालासाहेब ठाकरे को एक निर्णायक शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया।
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