

Balasaheb Thackeray Balwant Mantri Conflict: महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना और अनुशासन एक-दूसरे के पूरक माने जाते हैं। लेकिन 1967 में एक ऐसी घटना घटी जिसने सबको हैरान कर दिया था। पार्टी प्रमुख बालासाहेब ठाकरे के बेहद करीबी रहे बलवंत मंत्री ने जब संगठन के तौर-तरीकों पर सवाल उठाए, तो उन्हें मंच पर ही भयावह स्थिति का सामना करना पड़ा। आज बालासाहेब की जयंती पर जानिए क्या था वो पूरा किस्सा।
शिवसेना का गठन 1966 में हुआ था और महज एक साल के भीतर ही पार्टी महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी जड़ें जमा चुकी थी। उस दौर में बालासाहेब ठाकरे का कद निर्विवाद था, लेकिन उनके साथ एक और नाम प्रमुखता से उभर रहा था बलवंत मंत्री। उस समय बलवंत मंत्री को शिवसेना का दूसरा सबसे कद्दावर चेहरा माना जाता था। हर बड़े पोस्टर और मंच पर वह ठाकरे के साथ खड़े दिखाई देते थे। लेकिन सियासत में वर्चस्व और विचारधारा की जंग कभी भी छिड़ सकती है।
शिवसेना के शुरुआती दिनों में आंतरिक कामकाज को लेकर बालासाहेब ठाकरे और बलवंत मंत्री के बीच वैचारिक दूरियां बढ़ने लगी थीं। पत्रकार प्रकाश अकोलकर ने अपनी चर्चित किताब 'जय महाराष्ट्र' में इस पूरे घटनाक्रम का विस्तार से वर्णन किया है। अकोलकर लिखते हैं कि विवाद की नींव तब पड़ी जब बलवंत मंत्री ने पार्टी के भीतर 'लोकतंत्र' की वकालत शुरू कर दी। किस्सा 1967 का है, जब मुंबई के दादर स्थित वनमाली हॉल में शिवसेना की एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई गई थी। हॉल शिवसैनिकों से खचाखच भरा था। मंच पर बालासाहेब ठाकरे मौजूद थे और बलवंत मंत्री को भाषण देने के लिए आमंत्रित किया गया।
बलवंत मंत्री ने अपने संबोधन में कुछ ऐसा कह दिया जो वहां मौजूद कट्टर शिवसैनिकों को नागवार गुजरा। उन्होंने तर्क दिया कि शिवसेना को किसी एक व्यक्ति के इशारे पर चलने के बजाय लोकतांत्रिक ढंग से चलाया जाना चाहिए। उस समय शिवसैनिकों के लिए बालासाहेब का शब्द ही अंतिम सत्य होता था। जैसे ही बलवंत मंत्री ने व्यक्तिगत नियंत्रण के बजाय संगठन की बात की, भीड़ को लगा कि यह सीधे तौर पर बालासाहेब की सत्ता को चुनौती है।
देखते ही देखते सभा का माहौल तनावपूर्ण हो गया। शिवसैनिकों का एक समूह नारेबाजी करते हुए मंच की ओर झपटा। इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, कार्यकर्ताओं ने बलवंत मंत्री को पकड़ लिया।
किताब 'जय महाराष्ट्र' के अनुसार, गुस्साए शिवसैनिकों ने बलवंत मंत्री के साथ मारपीट शुरू कर दी। उन्हें जूतों से पीटा गया और धक्का-मुक्की में उनके कपड़े तक फट गए। बात यहीं नहीं रुकी, उग्र कार्यकर्ताओं ने उनके चेहरे और शरीर पर कालिख पोत दी। यह किसी भी बड़े नेता के लिए सार्वजनिक जीवन में सबसे बड़े अपमान की स्थिति थी।
तनाव इतना बढ़ गया था कि अपनी जान और मान बचाने के लिए बलवंत मंत्री फफक-फफक कर रोने लगे। अंततः उन्होंने मंच पर ही बालासाहेब ठाकरे के पैर पकड़ लिए और अपने शब्दों के लिए माफी मांगी। इस घटना ने साफ कर दिया था कि शिवसेना में 'ठाकरे' के फैसलों और उनके नेतृत्व पर सवाल उठाने की गुंजाइश नहीं है।