

Shakti Criminal Laws: पुणे के नसरापुर में एक 4 साल की मासूम बच्ची के साथ 65 वर्षीय नराधम द्वारा की गई दरिंदगी ने पूरे महाराष्ट्र की आत्मा को झकझोर कर रख दिया है। इस घटना के विरोध में पुणे-बैंगलोर हाईवे पर जनता का आक्रोश फूट पड़ा और घंटों तक चक्का जाम रहा। मासूमियत के इस कत्ल ने राज्य में एक बड़े सियासी और सामाजिक संग्राम को जन्म दे दिया है। विपक्ष के तमाम बड़े चेहरे, चाहे वे रोहित पवार हों, विजय वडेट्टीवार हों या पूर्व गृहमंत्री अनिल देशमुख, आज एक सुर में सरकार को घेरते हुए बस यही कह रहे हैं अगर आज राज्य में शक्ति कानून लागू होता, तो अपराधियों में खौफ होता और शायद यह मासूम आज हमारे बीच होती।
आखिर क्या है यह शक्ति कानून जिसे लेकर महाराष्ट्र की सियासत में उबाल आया हुआ है? क्या वाकई इसके आने से बलात्कारियों को 30 दिन में फांसी हो जाएगी? जानते हैं शक्ति कानून की हर वो बात जो आपके लिए जानना जरूरी है।
शक्ति कानून का प्राथमिक लक्ष्य यौन अपराधों के मामलों में जांच, मुकदमे और अपील के समय को कम करना है। इसका उद्देश्य ऐसे अनुकरणीय दंड (Exemplary Punishment) देना है जिससे अपराधियों के मन में कानून का खौफ पैदा हो।
यह विधेयक IPC, CrPC और पॉक्सो एक्ट में संशोधन कर सजा को और सख्त बनाता है, बलात्कार और सामूहिक बलात्कार के जघन्य मामलों में, जहाँ सबूत पुख्ता हों, वहां सीधे फांसी की सजा का प्रावधान है। तेजाब फेंकने या प्रयास करने पर 7 से 10 साल की जेल या आजीवन कारावास और भारी जुर्माने का प्रावधान है।
महिलाओं को डिजिटल माध्यमों या सोशल मीडिया पर बदनाम करना, धमकाना या उनका पीछा (Stalking) करना अब 2 साल तक की जेल और 1 लाख रुपये तक के जुर्माने के दायरे में आएगा। सोशल मीडिया और टेलीकॉम कंपनियों को जांच के लिए आवश्यक डेटा 7 कार्य दिवसों के भीतर देना होगा, वरना उन पर भी कार्रवाई होगी।
शक्ति कानून की सबसे बड़ी विशेषता इसकी समय सीमा है, FIR दर्ज होने के 30 कार्य दिवसों के भीतर जांच पूरी करनी होगी (विशेष परिस्थितियों में इसे 30 दिन और बढ़ाया जा सकता है)। अदालती सुनवाई 30 कार्य दिवसों के भीतर पूरी की जाएगी। ऊपरी अदालत में अपील का निपटारा 45 दिनों के भीतर करना होगा।
कानून के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए विशेष पुलिस इकाइयां गठित की जाएंगी जो केवल महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों की जांच करेंगी। साथ ही, इन मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए विशेष अदालतें (Special Courts) स्थापित की जाएंगी।
हालांकि यह विधेयक महाराष्ट्र विधानमंडल के दोनों सदनों द्वारा पारित किया जा चुका है, लेकिन तकनीकी कारणों से इसके पूर्ण कार्यान्वयन में देरी हुई है। 2020 में पेश किए जाने के बाद इसे संयुक्त प्रवर समिति (Joint Select Committee) को भेजा गया था ताकि इसकी कानूनी वैधता सुनिश्चित की जा सके। पुणे के नसरापुर व चाकण कांड के बाद अब विपक्ष मांग कर रहा हैं कि सरकार सभी तकनीकी अड़चनों को दूर कर इसे तत्काल प्रभाव से लागू करे।