पुणे में मासूमियत की चीख, आदतन दरिंदों के लिए स्वर्ग बना सिस्टम? मेधा कुलकर्णी ने बयां किया पीड़ित माँ का दर्द

Pune Child Case: अपराधी छूटते रहे और मासूम मरते रहे, पुणे कांड पर भाजपा सांसद मेधा कुलकर्णी ने आरोपी भीमराव कांबले के आपराधिक इतिहास का खुलासा करते हुए व्यवस्था को घेरा।
A Cry of Innocence in Pune: Has the System Become a Haven for Habitual Predators? Medha Kulkarni Articulates the Anguish of the Victim's Mother
मेधा कुलकर्णी (सोर्स: सोशल मीडिया)
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Medha Kulkarni Statement: महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी पुणे इस वक्त शर्मसार भी है और आक्रोशित भी। नसरापुर में 4 साल की बच्ची और चाकण में 3 साल के मासूम के साथ हुई दरिंदगी ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हमारे समाज में छोटे बच्चे अब कहीं भी सुरक्षित हैं? इस बीच, भाजपा सांसद मेधा कुलकर्णी ने पीड़ित परिवार से मुलाकात के बाद जो खुलासे किए हैं, वे रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं।

माँ का गुस्सा जायज है

सांसद मेधा कुलकर्णी ने नसरापुर की पीड़ित बच्ची की माँ से मुलाकात के बाद मीडिया से बात करते हुए कहा, मैं अभी उस माँ से मिलकर आ रही हूँ। उसकी आंखों में जो गुस्सा और बेबसी है, उसका सामना करना मुश्किल है। एक माँ अपनी 4 साल की बच्ची को खोने के बाद सरकार और कानून से क्या उम्मीद रखे? कुलकर्णी ने इस घटना के मुख्य आरोपी 65 वर्षीय भीमराव कांबले की कुंडली खोलते हुए बताया कि यह कोई पहली बार नहीं था जब उसने मासूमों को निशाना बनाया।

अपराधी का खौफनाक इतिहास

सांसद ने चौकाने वाली जानकारी देते हुए बताया कि भीमराव कांबले एक आदतन अपराधी (Habitual Offender) है।

  • 1998: उसके खिलाफ पहला गंभीर मामला दर्ज हुआ था।
  • 2015: उस पर दोबारा इसी तरह के जघन्य अपराध के लिए केस दर्ज हुआ।
  • हकीकत: वह हर बार कुछ साल की सजा काटकर या जमानत पर बाहर आ गया।

चाकण की त्रासदी

नसरापुर की आग अभी शांत भी नहीं हुई थी कि पुणे के चाकण (महालुंगे) इलाके से एक और खौफनाक खबर आई। यहाँ एक 3 साल के मासूम बच्चे के साथ कुकर्म करने के बाद उसकी गला रेतकर हत्या कर दी गई। यहाँ भी आरोपी एक 16 साल का किशोर है। मध्य प्रदेश से रोजी-रोटी की तलाश में आए इस मजदूर परिवार का एकमात्र सहारा अब छिन चुका है।

मानवीय संवेदनाओं का हनन और सामाजिक पतन

ये घटनाएं केवल अपराध नहीं हैं, ये समाज के नैतिक पतन की पराकाष्ठा हैं। एक तरफ 65 साल का बुजुर्ग है जिसे समाज में मार्गदर्शक होना चाहिए था, और दूसरी तरफ 16 साल का किशोर जिसके हाथों में कलम होनी चाहिए थी, दोनों ने ही मासूमियत का गला घोंट दिया।

सांसद मेधा कुलकर्णी का बयान इस बात की पुष्टि करता है कि जब तक आदतन अपराधियों के लिए कानून में कड़े बदलाव नहीं किए जाते और उन्हें ताउम्र सलाखों के पीछे नहीं रखा जाता, तब तक 'बेटी बचाओ' जैसे नारे केवल कागजों तक ही सीमित रहेंगे।

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