
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ रितु तावड़े (सोर्स: सोशल मीडिया)
Why BJP Chose Ritu Tawde For BMC Mayor: देश की सबसे अमीर नगर निगम, बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) को 9 साल के लंबे इंतजार के बाद अपना नया मेयर मिलने जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने घाटकोपर से तीन बार की पार्षद रितु तावड़े को मुंबई के 78वें मेयर पद के लिए अपना उम्मीदवार घोषित किया है। महायुति गठबंधन में हुए समझौते के तहत मेयर पद बीजेपी के पास आया है, जबकि डिप्टी मेयर का पद एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना को मिला है, जिसने संजय घाडी को अपना उम्मीदवार बनाया है।
रितु तावड़े का चयन केवल एक प्रशासनिक नियुक्ति नहीं, बल्कि बीजेपी की एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। आइए जानते हैं वे 5 बड़े कारण जिन्होंने रितु तावड़े के लिए मेयर की राह आसान की।
रितु तावड़े घाटकोपर (वार्ड 132) से तीसरी बार पार्षद चुनी गई हैं। वे बीएमसी की महत्वपूर्ण ‘शिक्षा समिति’ की अध्यक्ष रह चुकी हैं। उन्हें नगर निगम के कामकाज, बजट और नीतिगत निर्णयों की गहरी समझ है, जो देश की सबसे बड़ी नगर पालिका को चलाने के लिए अनिवार्य है।
मुंबई की राजनीति में ‘मराठी मानुस‘ का मुद्दा हमेशा हावी रहता है। रितु तावड़े मराठा समुदाय से आती हैं, लेकिन उन्होंने गुजराती और हिंदी भाषी बहुल इलाके घाटकोपर से जीत दर्ज कर अपनी व्यापक स्वीकार्यता साबित की है। बीजेपी ने उनके जरिए मराठी वोट बैंक और गैर-मराठी समर्थकों के बीच एक सटीक संतुलन साधने की कोशिश की है। इसे विपक्ष के मराठी बनाम गैर मराठी विवाद की काट भी माना जा रहा है।
इस बार मुंबई मेयर का पद ‘सामान्य श्रेणी (महिला)’ के लिए आरक्षित है। बीजेपी के पास कई विकल्प थे, लेकिन रितु तावड़े की बेदाग छवि और कार्यकर्ताओं के बीच उनकी लोकप्रियता ने उन्हें रेस में सबसे आगे रखा। 53 साल की रितु तावड़े न सिर्फ़ अनुभवी हैं, बल्कि एक तेजतर्रार व्यक्तित्व वाली नेता हैं। सदन में विपक्ष की आलोचना का सामना करने के लिए BJP को एक मजबूत लीडरशिप की जरूरत थी, जो तावड़े के रूप में पूरी होती दिख रही है।
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रितु तावड़े को बीजेपी संगठन का एक निष्ठावान चेहरा माना जाता है। संकट के समय हो या पार्टी के विस्तार की बात, उन्होंने हमेशा अनुशासन दिखाया है। पार्टी नेतृत्व को भरोसा है कि उनके नेतृत्व में बीएमसी और राज्य सरकार के बीच बेहतर समन्वय बना रहेगा।
महायुति के भीतर रितु तावड़े के नाम पर कोई बड़ा विरोध नहीं था। एकनाथ शिंदे की शिवसेना और अजित पवार की एनसीपी के साथ बेहतर संबंधों के चलते उन्हें गठबंधन के साझा उम्मीदवार के रूप में पेश करना आसान रहा।






