

Mohan Bhagwat: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष के अवसर पर मुंबई में आयोजित 'संघ यात्रा के 100 वर्ष: नए क्षितिज' व्याख्यानमाला में सरसंघचालक मोहन भागवत ने संगठन की भविष्य की दिशा और समावेशी विचारधारा पर अपनी बात रखी। इस ऐतिहासिक संबोधन में भागवत ने जातिवाद, भाषा विवाद और धर्मांतरण जैसे संवेदनशील मुद्दों पर संघ का रुख स्पष्ट किया। मुंबई के इस गरिमामयी कार्यक्रम में बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान समेत कई दिग्गज हस्तियों की मौजूदगी ने इसे और भी चर्चा में ला दिया।
संघ प्रमुख ने स्पष्ट संदेश दिया कि संघ का लक्ष्य संपूर्ण समाज को संगठित करना है और इसमें जाति या पंथ की कोई दीवार नहीं है।
मोहन भागवत ने संघ के भीतर जातिगत समीकरणों पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि संघ में किसी भी जाति का व्यक्ति सर्वोच्च पद (सरसंघचालक) तक पहुंच सकता है। उन्होंने जोर देकर कहा, "अनुसूचित जाति या जनजाति होना कोई बाधा नहीं है और ब्राह्मण होना कोई योग्यता नहीं है।" उन्होंने स्पष्ट किया कि सरसंघचालक न तो कोई ब्राह्मण बनेगा, न क्षत्रिय; जो भी इस पद पर आसीन होगा, वह केवल 'हिंदू' होगा। हालांकि, उन्होंने स्वीकार किया कि संघ की शुरुआत के समय ब्राह्मणों की संख्या अधिक थी, लेकिन आज संगठन समाज के हर वर्ग तक पहुँच चुका है।
अपने संबोधन में भागवत ने वैचारिक स्पष्टता देते हुए कहा कि 'सेक्युलरिज्म' के लिए 'धर्मनिरपेक्षता' शब्द गलत है, क्योंकि धर्म जीवन का आधार है; इसके लिए 'पंथनिरपेक्षता' शब्द का प्रयोग होना चाहिए। उन्होंने स्वदेशी जीवनशैली पर जोर देते हुए '5-B' का मंत्र दिया—भाषा, भूषा, भजन, भोजन और भ्रमण। उनके अनुसार, घर की चारदीवारी के भीतर ये पांचों चीजें अपनी (भारतीय) ही होनी चाहिए। अंग्रेजी भाषा पर उन्होंने कहा कि संघ का अंग्रेजी से बैर नहीं है और जरूरत पड़ने पर इसका उपयोग किया जाता है, लेकिन प्राथमिकता मातृभाषा और हिंदी को ही मिलनी चाहिए।
मुस्लिम इलाकों में काम करने की चुनौतियों और 'घर वापसी' जैसे मुद्दों पर संघ प्रमुख ने संतुलित दृष्टिकोण रखा। उन्होंने कहा कि यदि कहीं अपशब्द कहे जाते हैं, तो स्वयंसेवकों को प्रतिक्रिया देकर टकराव नहीं बढ़ाना चाहिए। धर्मांतरण पर उन्होंने कहा कि अलग-अलग धार्मिक विचारों का सम्मान होना चाहिए, लेकिन जबरन धर्मांतरण के मामलों में यदि लोग अपनी इच्छा से वापस आना चाहते हैं, तो संघ उनका स्वागत करता है। उन्होंने भाषा विवाद को एक 'स्थानीय बीमारी' बताया और इसे राष्ट्रीय स्तर पर फैलने से रोकने की अपील की। कार्यक्रम के अंत में उन्होंने बताया कि संघ किसी बाहरी फंडिंग से नहीं, बल्कि अपने स्वयंसेवकों की श्रद्धा और समर्पण से चलता है।