SC Sub-Classification: महाराष्ट्र में 'कोटे के अंदर कोटा' की हलचल, महायुति सरकार का बड़ा मास्टरस्ट्रोक!

SC Sub-Classification: महाराष्ट्र में 'कोटे के अंदर कोटा' की तैयारी! SC उप-वर्गीकरण के लिए महायुति सरकार ने बनाई नई समिति, जानें दलित राजनीति पर इसका असर।
Maharashtra's Mahayuti govt forms a new committee for SC sub-classification (Quota within Quota) following the Supreme Court's landmark ruling.
सीएम देवेंद्र फडणवीस (सौजन्य-सोशल मीडिया)
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SC Sub-Classification News: इस सप्ताह की शुरुआत में बीजेपी के नेतृत्व वाली महायुति सरकार ने अनुसूचित जातियों (एससी) के उप-वर्गीकरण की जांच के लिए एक नई समिति बनाई। इस कदम के पीछे शायद 3 मुख्य कारण हैं- सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला जिसने इस कदम को मुमकिन बनाया, दलित समुदायों के भीतर आरक्षण के फायदों तक असमान पहुंच को लेकर लंबे समय से चली आ रही चिंताएं और 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद दलितों के वोट देने के तरीके से पैदा हुई एक राजनीतिक जरूरत। गौरतलब है इसमें पार्टी की सीटों की संख्या 2019 की 23 सीटों से घटकर 9 रह गई थी।

सीएम ने बनाई एक नई समिति

कैबिनेट ने बुधवार को एक नई समिति की घोषणा की जिसका नेतृत्व मुख्य सचिव राजेश अग्रवाल करेंगे। इस समिति का काम एससी के उप-वर्गीकरण को लेकर मिले आवेदनों और सुझावों की जांच करना है। इस समिति से कहा गया है कि वह एक महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट जमा करे। रिटायर्ड जज अनंत मनोहर बदर की अध्यक्षता वाली पिछली समिति द्वारा रिपोर्ट जमा किए जाने के बाद उठाया गया है। समिति का गठन 2024 में सुको के एक फ़ैसले के बाद किया गया था, जिसमें राज्यों को एससी आरक्षण के भीतर उप-श्रेणियां बनाने की अनुमति दी गई थी। बदर समिति को 2024 में विस चुनावों से पहले तत्कालीन एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा नियुक्त किया गया था। इस समिति को उप-वर्गीकरण के लिए एक मसौदा तैयार करने, सुको के फैसले की जांच करने और दूसरे राज्यों द्वारा अपनाए गए मॉडलों का अध्ययन करने का काम सौंपा गया था।

न्यायसंगत बंटवारा मकसद

अनुसूचित जातियों का उप-वर्गीकरण (SC Sub-Classification) जिसे अक्सर 'कोटे के अंदर कोटा' कहा जाता है में मौजूदा एससी आरक्षण को इस श्रेणी के भीतर अलग-अलग जाति समूहों के लिए छोटे-छोटे हिस्सों में बांटना शामिल है। जहां कुल कोटा वही रहता है वहीं जनसंख्या, सापेक्ष पिछड़ेपन और अवसरों तक पहुंच जैसे मानदंडों के आधार पर इसके कुछ हिस्से अलग से तय किए जाते हैं। यह मांग इस चिंता से पैदा हुई है कि महाराष्ट्र में नव-बौद्ध दलित सरीखे जो समूह अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में और ज्यादा संगठित हैं। उन्हें आरक्षण से अनुपातहीन रूप से ज्यादा फायदा मिला है। इसके उलट मातंग जैसे छोटे और ज्यादा हाशिए पर पड़े समुदाय पीछे रह गए हैं, इसलिए उप-वर्गीकरण (SC Sub-Classification) को फायदों के ज्यादा न्यायसंगत बंटवारे को सुनिश्चित करने के एक तरीके के रूप में देखा जाता है।

महाराष्ट्र में 1.32 करोड़ दलित

महाराष्ट्र के राजनीतिक परिदृश्य में दलित एक अहम भूमिका निभाते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य में एससी की संख्या लगभग 1.32 करोड़ है जो कुल जनसंख्या का 11.81% है और इसमे 59 से ज्यादा अलग-अलग जातियां शामिल हैं। एक ही तरह का समूह होने की बजाय दलित समुदाय बहुत ज्यादा विविध है। इसके सबसे बड़े हिस्सों में आआंबेडकरवादी आंदोलन के अनुयायी शामिल है।

विशेष रूप से महार समुदाय, इनमें से कई लोगों ने जाति-व्यवस्था को नकारते हुए और समानता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाते हुए बीआर आंबेडकर के नेतृत्व में बौद्ध धर्म अपना लिया था, नव-बौद्ध दलित जनसंख्या का लगभग 40% हिस्सा बनाते है और उनका राजनीतिक लामबंदी अवसर सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण पर केंद्रित रही है, जिसके चलते वे अक्सर बीजेपी और अविभाजित शिवसेना जैसी पार्टियों के विरोध में खड़े नजर आते हैं वहीं दूसरी ओर बीजेपी को ऐतिहासिक रूप से मातंग जैसे छोटे दलित समूहों का समर्थन मिलता रहा है।

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