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51 लाख करोड़ की इकॉनमी… पर हर 3 घंटे में एक किसान की मौत! जानें महाराष्ट्र के विकास का ये कड़वा सच
- Written By: गोरक्ष पोफली
NCRB Farmer Suicide: एक तरफ 51 लाख करोड़ की अर्थव्यवस्था का गौरव, तो दूसरी तरफ हर 3 घंटे में एक किसान की मौत। जानिए महाराष्ट्र के विकास और विदर्भ-मराठवाड़ा में बढ़ते कृषि संकट का कड़वा सच।

महाराष्ट्र में किसान आत्महत्या की सांकेतिक फोटो (सोर्स: एआई फोटो)
Maharashtra Farmer Suicides NCRB Report: एक तरफ गगनचुंबी इमारतें, बुलेट ट्रेन के सपने और 51 लाख करोड़ रुपये की विशाल अर्थव्यवस्था का गौरव है, तो दूसरी तरफ उसी मिट्टी को अपने खून-पसीने से सींचने वाले किसान की खामोश चीखें। यह एक ऐसा विरोधाभास है जो दिल को झकझोर देता है भारत की आर्थिक प्रगति का इंजन कहा जाने वाला महाराष्ट्र, आज अपने ही अन्नदाताओं के लिए कब्रगाह साबित हो रहा है। जिस राज्य का देश की जीडीपी में 14% योगदान है, उसी राज्य में हर तीन घंटे में एक किसान अपनी जान दे रहा है। विकास की इस चमक के पीछे विदर्भ और मराठवाड़ा के खेतों में फैला अंधियारा आज एक राष्ट्रीय चिंता का विषय है।
आर्थिक आंकड़ों की चमक और धरातल का अंधेरा
महाराष्ट्र वर्तमान में भारत की सबसे बड़ी राज्य अर्थव्यवस्था बना हुआ है, जिसका सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) वर्ष 2025-26 के लिए 51,00,597 करोड़ रुपये अनुमानित है। राज्य की प्रति व्यक्ति आय भी राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक 3,47,903 रुपये है। लेकिन इस समृद्धि के समानांतर, आंकड़ों का दूसरा पहलू अत्यंत भयावह है। NCRB के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 1995 से 2023 के बीच भारत में 3.9 लाख से अधिक किसानों और खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की, जिसमें महाराष्ट्र लगातार शीर्ष पर रहा है।
वर्ष 2025 की पहली तिमाही (जनवरी-मार्च) में ही राज्य में 767 किसान आत्महत्याएं दर्ज की गईं, जिसका अर्थ है कि औसतन हर 3 घंटे में एक किसान ने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। इसमें से विदर्भ का हिस्सा सबसे अधिक रहा, जहां अकेले पश्चिमी विदर्भ के पांच जिलों ने 33% (257 मामले) आत्महत्याएं दर्ज कीं। मराठवाड़ा में भी स्थिति गंभीर रही, जहां इसी अवधि में 192 मामले सामने आए।
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विरोधाभास के प्रमुख कारण: क्यों परेशान है किसान?
वर्ष 2023 में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखा गया जब आत्महत्या करने वालों में खेती करने वाले मालिकों (4,690) की तुलना में खेतिहर मजदूरों (6,096) की संख्या अधिक थी। मजदूरी में असुरक्षा, मौसमी बेरोजगारी और बढ़ती खाद्य कीमतों ने भूमिहीन मजदूरों को आर्थिक रूप से तोड़ दिया है। 2026 के खरीफ सीजन में किसान तीन तरफा मार झेल रहे हैं। मध्य पूर्व में तनाव के कारण उर्वरकों की कीमतों में 40% तक की वृद्धि हुई है, जिससे प्रति एकड़ खेती की लागत 4,000 से बढ़कर 6,000 रुपये तक पहुँच गई है। वहीं, सोयाबीन जैसे उत्पादों की बाजार कीमतें न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से काफी नीचे गिर गई हैं।
बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि और सूखे जैसी आपदाओं ने फसलों को भारी नुकसान पहुँचाया है। वर्ष 2025-26 में कपास उत्पादन में 47.4% की भारी गिरावट देखी गई, जो 90 लाख मीट्रिक टन से घटकर केवल 51 लाख मीट्रिक टन रह गया। किसान आत्महत्या का मुख्य कारण कर्ज का बोझ पाया गया है, जो बैंक और साहूकारों दोनों से लिया जाता है। हालांकि सरकार ने ₹2 लाख तक की पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होल्कर शेतकनी कर्जमाफी योजना की घोषणा की है, लेकिन कार्यान्वयन की जटिलताएं अभी भी एक बाधा हैं। राज्य की ₹1 फसल बीमा योजना को व्यापक धोखाधड़ी और फर्जी दावों (लगभग 8 लाख फर्जी मामले) के कारण रद्द करना पड़ा। इससे वास्तविक किसानों को मिलने वाली सहायता में देरी हुई और सिस्टम के प्रति अविश्वास बढ़ा।
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सरकारी प्रयास और भविष्य की राह
संकट को दूर करने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने 7.69 लाख करोड़ रुपये का बजट पेश किया है। इसमें कृषि क्षेत्र के लिए कुछ महत्वपूर्ण पहल की गई हैं।
- किसानों को 7.5 HP तक के पंपों के लिए मुफ्त बिजली देने हेतु 20,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
- खेती में तकनीक को बढ़ावा देने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पायलट प्रोजेक्ट और नवाजी देशमुख कृषि संजीवनी परियोजना के दूसरे चरण पर निवेश किया जा रहा है।
- नदी जोड़ने वाली बड़ी सिंचाई परियोजनाओं (जैसे वैगंगा-नलगंगा) पर 88,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च करने की योजना है ताकि सूखा प्रभावित क्षेत्रों को राहत मिल सके।
महाराष्ट्र का संकट यह दर्शाता है कि केवल जीडीपी की वृद्धि कृषि क्षेत्र की खुशहाली की गारंटी नहीं है। जब तक किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य और विश्वसनीय सुरक्षा तंत्र नहीं मिलता, तब तक यह आर्थिक महाशक्ति अपने अन्नदाताओं के बोझ तले दबी रहेगी।
Maharashtra economic growth vs maharashtra farmer suicides ncrb report analysis
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