
गड़चिरोली में बढ़ता पलायन (सौजन्य-नवभारत)
Migration Impact on Children: गड़चिरोली जिले की घटना केवल एक 10 वर्षीय बच्चे की आत्महत्या की खबर नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था का आईना है, जिसमें विकास के दावे तो ऊंचे हैं, लेकिन आम इंसान की जिंदगी आज भी असुरक्षित है। चौथी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे की मौत ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हमारा विकास वास्तव में मानव-केंद्रित है या केवल आंकड़ों और घोषणाओं तक सीमित रह गया है।
संस्कार के माता-पिता रोजगार की तलाश में तेलंगाना गए, क्योंकि उनके गांव में काम नहीं था। यह स्थिति गड़चिरोली जैसे आदिवासी और ग्रामीण जिलों की आम सच्चाई है। खेती पर निर्भरता, सीमित रोजगार के साधन और उद्योगों का असमान वितरण ये सभी कारण मजदूर परिवारों को अपने बच्चों को पीछे छोड़कर पलायन के लिए मजबूर करते हैं।
यह मजबूरी ही आगे चलकर बच्चों के लिए मानसिक संकट बन जाती है। दस साल की उम्र में बच्चा भावनात्मक रूप से माता-पिता पर पूरी तरह निर्भर होता है। बच्चा रोज खाली घर में लौटता था, जहां न मां की ममता थी, न पिता का सहारा। यह अकेलापन धीरे-धीरे डर, असुरक्षा और मानसिक दबाव में बदल गया। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि न समाज, न स्कूल और न ही व्यवस्था इस बढ़ते दर्द को समय रहते पहचान सकी।
बालक स्कूल जाता था, पढ़ाई में ठीक था, शांत स्वभाव का था फिर भी उसकी पीड़ा किसी शिक्षक, पड़ोसी या सामाजिक संस्था को दिखाई नहीं दी। यह घटना बताती है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक सुरक्षा पर कितना कम ध्यान देती है। स्कूल केवल पाठ्यक्रम तक सीमित रह गया है, जबकि उसे बच्चों के जीवन का सुरक्षा कवच होना चाहिए।
एक ओर गड़चिरोली को “स्टील हब” बनाने की घोषणाएं हैं, उद्योगों और रोजगार के वादे हैं; दूसरी ओर ग्रामीण मजदूर आज भी रोजगार के लिए राज्य छोड़ने को मजबूर हैं।
यह विरोधाभास बताता है कि विकास की योजनाएं स्थानीय लोगों तक नहीं पहुंच रहीं। यदि उद्योग सचमुच आ रहे हैं, तो उनका लाभ उन परिवारों तक क्यों नहीं पहुंचता, जिनके बच्चे इस तरह अपनी जान गंवा रहे हैं।
बच्चे की मौत को केवल आत्महत्या कहना इस त्रासदी को छोटा कर देना होगा। यह एक सामाजिक हत्या है, जिसमें गरीबी, बेरोजगारी, पलायन, कमजोर सामाजिक ढांचा और संवेदनहीन व्यवस्था सभी की भूमिका है। यदि गांव में रोजगार होता, पलायन करने वाले परिवारों के बच्चों के लिए देखभाल और सहायता की ठोस व्यवस्था होती, तो शायद यह हादसा टल सकता था।
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यह घटना एक चेतावनी है, रोजगार को स्थानीय स्तर पर प्राथमिकता दी जाए, पलायन करने वाले मजदूरों के बच्चों के लिए ग्राम-स्तर पर निगरानी और सहायता तंत्र बने, स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दिया जाए। विकास की हर योजना का मूल्यांकन “मानवीय प्रभाव” के आधार पर हो, बच्चा अब लौटकर नहीं आएगा।
लेकिन अगर यह घटना भी केवल एक खबर बनकर भूल दी गई, तो सवाल यह नहीं होगा कि “संस्कार क्यों गया?”, बल्कि यह होगा कि “अगला संस्कार कौन होगा?” यह समय आत्मकथन का होगा क्योंकि रोजगार के बिना विकास अधूरा है और इंसानी दर्द से कटकर खड़ा किया गया कोई भी विकास टिकाऊ नहीं हो।






