
कला से ही बचेगा आदिवासी इतिहास (सौजन्यः सोशल मीडिया)
Gadchiroli District: आदिवासियों की कला और संस्कृति महान है, उनका इतिहास गौरवशाली रहा है। कला और संस्कृति का संरक्षण ही उनके इस गौरवशाली इतिहास को जीवित रख सकता है। यह बात राज्य के आदिवासी विकास मंत्री डॉ. अशोक उईके ने कही। भगवान बिरसा कला मंच और कै. लक्ष्मणराव मानकर स्मृति संस्था के संयुक्त तत्वावधान में गडचिरोली के संस्कृति सभागृह में आयोजित ‘भगवान बिरसा कला संगम पूर्व विदर्भ विभागीय फेरी’ के पुरस्कार वितरण समारोह में वे मार्गदर्शन कर रहे थे।
कार्यक्रम में विधायक डॉ. मिलिंद नरोटे, पूर्व सांसद डॉ. अशोक नेते, पूर्व विधायक डॉ. नामदेव उसेंडी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विभागीय संघचालक जयंत खरवडे, कै. लक्ष्मणराव मानकर ट्रस्ट के सचिव प्रशांत बोपर्डीकर, बाबूराव कोहले सहित अनेक गणमान्य उपस्थित थे।
डॉ. उईके ने कहा कि भगवान बिरसा कला संगम के उपक्रम को आदिवासी समाज के कलाकारों ने व्यापक प्रतिसाद दिया है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस लगातार आदिवासी समाज के उत्थान के लिए प्रयासरत हैं। उनके कारण ही आदिवासी बहुल क्षेत्रों के युवक-युवतियों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का अवसर मिल रहा है।
उन्होंने आगे कहा कि आदिवासी समाज में सहादेव, सातदेव जैसे देवों की परंपरा रही है। एक ही देव मानने वाले आदिवासी एक-दूसरे से विवाह नहीं करते। यह अनोखी सांस्कृतिक परंपरा है, जिसे आगे भी बनाए रखने के लिए सभी को प्रयास करना चाहिए।
इस अवसर पर विभिन्न प्रतियोगिताओं के विजेताओं को स्मृतिचिह्न और नगद राशि देकर सम्मानित किया गया। दो दिन चली प्रतियोगिताओं के परीक्षक मारोतराव इचोडकर, संजय धात्रक, संजय घोटेकर, लक्ष्मण शेडमाके, दुर्गा मडावी और महेश मडावी रहे। कार्यक्रम का संचालन भारत भुजाडे ने किया, जबकि राकेश उईके ने आभार व्यक्त किया।
डॉ. उईके ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में जनजातीय गौरव वर्ष मनाने का निर्णय लिया है। इसी के तहत आदिवासी कला और संस्कृति के संरक्षण के लिए कला संगम का आयोजन किया जा रहा है। इससे समाज को आदिवासियों की उत्कृष्ट कला और संस्कृति की पहचान हो रही है।
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उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज में अनेक प्रतिभाशाली कलाकार हैं, लेकिन उन्हें उचित पहचान नहीं मिल पाती। राज्य सरकार का आदिवासी विकास विभाग अब इन कलाकारों की प्रतिभा को पहचान देने और उनके संरक्षण की दिशा में गंभीरता से कार्य कर रहा है।
“आदिवासी समाज की गायन, वादन, हस्तकला, चित्रकला और लोकसंस्कृति पर अनुसंधान व प्रबंध तैयार किए जाने की आवश्यकता है,” ऐसा मत भी डॉ. उईके ने व्यक्त किया।






