
कुसुंबी में उजाड़े घर (सौजन्य-नवभारत)
Manikgarh Cement Controversy: जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया पूर्ण किए बगैर सीमेंट कंपनी की ओर से उत्खनन शुरू किए जाने से बरसों से मुआवजे की मांग कर रहे जिले के जिवती तहसील के विवादित ग्राम कुसुंबी के 24 घरों पर शुक्रवार को कंपनी द्वारा बुलडोजर चलाया गया। इस घटना से ग्रामीणों में असंतोष व्याप्त है।
गौरतलब है कि, जिवती तहसील के ग्राम कुसुंबी की 62.62 हेक्टेयर कृषि जमीन जिला प्रशासन की ओर से वर्ष 1985 को मानिकगढ़ सीमेंट को लीज पर दी गई है, जिससे इस जमीन पर रह रहे आदिवासियों का जीवनयापन संकट में है। कंपनी ने इस जमीन पर लाइमस्टोन का उत्खनन शुरू करने से ग्राम कुसुंबी के प्रकल्प पीड़ित आदिवासी किसानों को खेती करना भी असंभव हो रहा है।
यह ग्रामीण लीज पर दिए गए जमीन के बदले में उचित मुआवजा पाने के लिए प्रशासन के पास बरसों से गुहार लगा रहे है। यह मामला न्यायप्रविष्ट भी है तथा इस मामले की उच्च न्यायालय के नागपुर खंडपीठ में सुनवाई चल रही है।
4 तथा 5 फरवरी को अचानक पीड़ित ग्रामीणों के हाथ में अग्रीमेंट की कॉपी के साथ नोटिस थमाए गए और कुछ समझ में आने से पहले ही 6 फरवरी को ग्रामीणों के 24 घरों पर बुलडोजर चलाकर उन्हें ध्वस्त किया गया। मुआवजे की प्रक्रिया पूर्ण किए बगैर ही की गई इस तोड़ू कार्रवाई से ग्रामीणों में आक्रोश और असंतोष व्याप्त है।
उल्लेखनीय है कि, उच्च न्यायालय में हुई सुनवाई के आधार पर मानिकगढ़ सीमेंट प्रबंधन ने उक्त ग्रामीणों के साथ 30 सितंबर 2025 को एक बैठक लेकर प्रकल्प पीड़ित आदिवासियों को यथाशीघ्र मुआवजा देने का भरोसा दिलाया था। ग्रामीणों का कहना है कि, कंपनी ने अपना वादा पूरा नहीं किया और बिना किसी मुआवजे दिए ही उनके झोपड़ियों पर बुलडोजर चलाते हुए उन्हें बेघर कर दिया है।
यह भी उल्लेखनीय है कि, कुसुंबी के ग्रामीणों को न्याय दिलाने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता विनोद खोबरागड़े की ओर से न्यायालय में एक रिट पिटीशन दायर की गई है, तथा इस मामले पर उच्च न्यायालय ने 2 सप्ताह के भीतर जिला प्रशासन और कंपनी प्रबंधन से स्पष्टीकरण मांगा है। इस प्रकरण में अगली सुनवाई 9 फरवरी 2026 को संभावित है। ग्रामीणों ने घर तोड़ने की इस कार्रवाई को अन्यायपूर्ण बताया है।
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याचिकाकर्ता ने न्यायालय को इस बात से अवगत कराया है कि, ग्राम कुसुंबी के 24 आदिवासी किसानों की 63.63 हेक्टेयर जमीन प्रशासन की ओर से वर्ष 1985 से सीमेंट कंपनी को प्रति हेक्टेयर 12 हजार 500 रुपयों के दर से लीज पर दी है। किन्तु यह रकम भी अभी तक कंपनी की ओर से पीड़ितों को नहीं मिल सकी है। और कंपनी की ओर से उक्त जमीन से विगत 45 वर्ष से उत्खनन कर लाइमस्टोन निकाला जा रहा है। और जिला प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है।
यह भी उल्लेखनीय है कि, उक्त गांव आदिवासी बहुल है तथा वह पेसा कानून के तहत आता है। ग्रामीणों ने बताया कि, इस मामले को लेकर एक ओर प्रकरण न्यायप्रविष्ट है वहीं दूसरी ओर कंपनी के अधिकारियों ने कुछ दिनों पूर्व गांव में आकर संबंधित ग्रामीणों के यह कहकर अंगूठे तथा हस्ताक्षर लिए कि, उन्हें 30 सितंबर 2025 से पहले मुआवजा दिया जाएगा। याचिकाकर्ता की ओर से यह सब जानकारी न्यायालय के समक्ष रखी गई है।






