न घर के, न घाट के...रात 2 बजे की 'डील' और पलट गई चंद्रपुर की बाजी! कांग्रेस ने अपनों पर ही फोड़ा हार का ठीकरा

Chandrapur Mayor Election Congress: बहुमत के करीब होकर भी हारी कांग्रेस। धानोरकर और वडेट्टीवार की जंग का भाजपा ने उठाया फायदा। रात 2 बजे मुनगंटीवार के घर बनी रणनीति।
Despite having 30 corporators, Congress loses Chandrapur Municipal Corporation due to internal rift between Pratibha Dhanorkar and Vijay Wadettiwar. BJP wins with 32 votes.
चंद्रपुर महापौर (फाइल फोटो)
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Chandrapur Mayor Politics: चंद्रपुर मनपा चुनाव में बहुमत के बेहद करीब पहुंचने पर भी कांग्रेस को यहां सिर्फ स्थानीय नेताओं के बीच जारी अंतर्कलह के चलते सत्ता से दूर होने की शर्मिंदगी झेलनी पड़ी है। और कांग्रेसी नेताओं के बीच विवादों का बेहतर लाभ उठाने में भाजपा सफल रही है।

मनपा में कांग्रेस गठबंधन के पास 30 पार्षद थे उन्हें बहुमत के लिए सिर्फ 4 अन्य पार्षदों की जरूरत थी किंतु कांग्रेस गठबंधन यह 4 पार्षद जुटाने में पूर्णतः विफल रहा नतीजतन सिर्फ 24 पार्षदों के संख्याबल के साथ मैदान में उतरी भाजपा गठबंधन 8 अन्य पार्षदों का समर्थन जुटाकर सत्ता पर काबिज होने में सफल रही।

...तो भागमभाग की नौबत नहीं आती

कांग्रेस के स्थानीय नेता विजय वडेट्टीवार और सांसद प्रतिभा धानोरकर के बीच मनपा चुनाव के पहले से ही सीटों के बंटवारे को लेकर विवाद चल रहा था। इस विवाद में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को मध्यस्थता करनी पड़ी थी। धानोरकर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के सामने आखिर तक इसी बात पर अडिग रही कि, उनके निर्वाचन क्षेत्र में उसे वडेट्टीवार की दखलंदाजी मंजूर नहीं।

मनपा प्रत्याशियों के चयन में भी वह किसी की दखलंदाजी स्वीकार नहीं करेगी। पार्टी आलाकमान को प्रतिभा धानोरकर की इस बात को मजबूरन मानना पड़ा और यहीं से चंद्रपुर मनपा में कांग्रेस की उल्टी गिनती शुरू हो गई थी। धानोरकर ने वडेट्टीवार समर्थक कई दिग्गज प्रत्याशियों के टिकट काटे, वंचित बहुजन आघाडी, शिवसेना (यूबीटी) जैसे समविचारी पार्टियों के साथ गठबंधन के प्रस्तावों को सिरे से खारिज कर दिया।

नतीजतन यहां कांग्रेस सिर्फ 27 सीटों पर विजयी रही। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि, अगर इस चुनाव में धानोरकर अपनी हठधर्मिता से बाहर निकलती और कुछ दिग्गज प्रत्याशियों के टिकट नहीं काटती तो कांग्रेस गठबंधन यहां करीब 40 सीटों तक जीत दर्ज करने में सफल होती और उसे सत्ता के लिए भागमभाग करने की नौबत नहीं आती।

न घर के न घाट के

महापौर चुनाव के बाद कांग्रेस की न घर की न घाट की जैसी स्थिति हो गई है। इस पराजय के लिए अब कांग्रेसी सांसद शिवसेना (यूबीटी) और वंचित बहुजन आघाडी के पार्षदों पर हार का ठीकरा फोड़ रही है, जबकि यह दोनों दल चुनाव से पहले साथ नहीं लेने पर अब कोसने में कोई अर्थ नहीं होने की बात कर रहे है। कांग्रेस के दोनों नेताओं के बीच कांग्रेस गुटनेता और महापौर चुनाव को लेकर भी विवाद चरम पर पहुंचा था, तब भी इस विवाद में पार्टी आलाकमान को मध्यस्थता करनी पड़ी थी। उस वक्त पार्टी आलाकमान की ओर से फार्मूला तय कर दिया गया था।

फार्मूले ने ही कांग्रेस को सत्ता से बाहर फेंक दिया

फार्मूले के तहत पहले ढाई साल तक महापौर धानोरकर का और दूसरे ढाई साल तक महापौर वडेट्टीवार समर्थक का तय किया गया था। शिवसेना (यूबीटी) के पार्षद कांग्रेस को समर्थन देने के लिए पहली टर्म में मेयर पद की शर्त पर अडिग थे। उनकी बातचीत वडेट्टीवार से चल रही थी किन्तु इस बातचीत में स्वयं धानोरकर कहीं शामिल नहीं थी। धानोरकर की तरफ से सुनील केदार बैठकों में उपस्थित हो रहे थे।

जब शिवसेना (यूबीटी) को इस बात का विश्वास हुआ कि, कांग्रेस उन्हें मेयर पद देने को तैयार नहीं, उन्होंने ऐन वक्त पर भाजपा नेताओं के पास अपना प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव पर भाजपा के सुधीर मुनगंटीवार के निवास पर रात 2 बजे तक मंथन चलता रहा, आखिरकार भाजपा ने शिवसेना (यूबीटी) को सवा वर्ष बाद महापौर पद देने का लिखित वायदा किया और शिवसेना (यूबीटी) ने महापौर चुनाव के दिन ऐन वक्त पर भाजपा को समर्थन का अपना फैसला घोषित किया। कांग्रेसी नेताओं के इस आपसी विवाद का पूर्ण लाभ लेने की कवायद में भाजपा अल्पमत के बावजूद बाजीगर साबित हुई।

  • नवभारत लाइव पर चंद्रपुर से संजय तायड़े की रिपोर्ट
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