नाना पटोले ने राजनीति से बनाई दूरी, कार्यक्रमों-बैठकों और OBC सम्मेलन से नदारद, चर्चाएं तेज

Nana Patole News: कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष नाना पटोले ने अब खुद को राजनीति से दूर कर लिया है। इन दिनों कांग्रेस की सभाओं, कार्यक्रमों और ओबीसी सम्मेलनों से नाना पटोले नदारद रहे।
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नाना पटोले (सौजन्य-IANS)
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Bhandara News: महाराष्ट्र कांग्रेस के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष और ओबीसी नेता विधायक नाना पटोले इन दिनों राजनीतिक मंचों से दूरी बनाकर चल रहे हैं। पिछले कुछ महीनों से वे किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम, सभा या पार्टी मीटिंग में नजर नहीं आए हैं। सकल ओबीसी समाज के सम्मेलन सहित कई महत्वपूर्ण आयोजनों से उनकी अनुपस्थिति ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दिया है।

महाराष्ट्र की बदहाली के लिए केंद्र व राज्य सरकार जिम्मेदार

हालांकि नाना पटोले ने सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि महाराष्ट्र की बदहाली के लिए केंद्र और राज्य दोनों सरकारें जिम्मेदार हैं। कौन कितना लूट रहा है, इसी पर काम चल रहा है। उनके इस बयान ने एक बार फिर राजनीतिक माहौल गर्म कर दिया है। पटोले ने अपनी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत कांग्रेस से की थी। किसानों और ओबीसी के विषय को लेकर भाजपा में चले गए, लेकिन बाद में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की नीतियों का विरोध करते हुए उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम लिया।

पटेल को किया था पराजित

राहुल गांधी के निकट माने जाने वाले पटोले को राष्ट्रीय स्तर पर किसान महासंघ का अध्यक्ष पद भी दिया गया। भंडारा-गोंदिया लोकसभा क्षेत्र में भाजपा टिकट पर उन्होंने दिग्गज नेता प्रफुल पटेल को पराजित कर अपनी ताकत दिखाई थी। इसके बाद उन्होंने नागपुर में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के खिलाफ चुनाव लड़ा, हालांकि उन्हें सफलता नहीं मिल सकी। लोकसभा में पराजय के बाद वे भंडारा लौटे और विधानसभा चुनाव जीतकर महाराष्ट्र विधानसभा के सभापति बने। लेकिन उनकी बागी प्रवृत्ति के कारण यह कार्यकाल अधिक दिन नहीं चला। इसके बाद उन्हें महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया, जहां उन्होंने संगठन में अपना प्रभाव मजबूत किया। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के दौरान नाना पटोले कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में शामिल थे।

एकाधिकारवादी रवैये से पार्टी के भीतर असंतोष

लोकसभा चुनावों के लिए उम्मीदवार चयन में भी उनकी भूमिका अहम रही। परंतु, उनके आक्रामक और एकाधिकारवादी रवैये से पार्टी के भीतर असंतोष पनपने लगा। महाविकास आघाड़ी सरकार बनने के बाद सीटों के बंटवारे में उनके अत्यधिक हस्तक्षेप के चलते केंद्रीय नेतृत्व ने उन्हें निर्णय प्रक्रिया से अलग कर दिया। इसके बाद से ही पटोले की पार्टी में पकड़ कमजोर पड़ने लगी।

अब अलिप्तता और अटकलों का दौर

लोकसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस ने पराजय की जिम्मेदारी नाना पटोले पर डालते हुए उनसे प्रदेशाध्यक्ष और विधानसभा दल नेता का पद छीन लिया। तब से वे धीरे-धीरे राजनीतिक गतिविधियों से दूर होते गए हैं। अब वे शायद ही किसी कार्यक्रम में नज़र आते हैं, जिससे उनके भाजपा में शामिल होने की अटकलें भी तेज़ हो गई हैं। दूसरी ओर, कांग्रेस में रहते हुए भी उन्हें कोई ठोस जिम्मेदारी नहीं दी गई है।

राजनीति से उनकी यह दूरी केवल विश्राम है या किसी बड़े राजनीतिक कदम की तैयारी, इस पर अभी संशय बना हुआ है। फिलहाल, नाना पटोले की अगली राजनीतिक चाल पर पूरे महाराष्ट्र की निगाहें टिकी हुई हैं। इस बीच उन्होंने महाराष्ट्र की बदहाली के लिए केंद्र और राज्य दोनों सरकारों को जिम्मेदार बताकर माहौल को गर्म कर दिया।

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