Father’s Day: ‘पापा कभी नहीं रोते’… लेकिन क्या सच में? जिम्मेदारियों के बोझ तले दबे भारतीय पुरुषों का दर्द
Father’s Day 2026: आमतौर पर दुनिया भर के पुरुष अपनी भावनाओं को कंट्रोल करते हैं। जिन स्थितियों में मांओ का रोना सामान्य है, उसमें भी पिता नहीं रोते हैं, क्यों कि मर्दों का रोना नॉर्मल नहीं मानते हैं।
- Written By: रीता राय सागर
फादर्स डे (फोटो.सोशल मीडिया)
Father’s Day Kab Hai: ये सच है कि आंसू या रोना हमारी भावनाओं की एक प्रतिक्रिया होती है, लेकिन ये बात भी उतनी ही सच है कि महिलाओं के आंसू जल्दी आते हैं। वो सहज तौर पर रो लेती हैं और अपनी भावनाओं को व्यक्त कर लेती हैं, लेकिन मर्द औरतों की तुलना में अपनी भावनाओं को कम व्यक्त करते हैं।
पापा या समाज का कोई भी मर्द उस समय भी नहीं रोते या रोना उनके लिए कठिन होता है, जब वो जीवन में बेहद भावनात्मक दौर से गुजर रहे होते हैं। आखिर इसकी वजह क्या है, इसका कारण सामाजिक और वैज्ञानिक दोनों हो सकता है।
रोना बहुत जरूरी है। इससे तनाव और भावनात्मक रूप से हुई तकलीफ कम होती है। तकलीफ में रो लेने से मन और दिमाग हल्का महसूस करते हैं। अच्छे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए यह एक बड़ा पहलू भी है, लेकिन पुरुष आमतौर पर अपने प्रियजनों मसलन माता-पिता आदि को खोने के बाद भी अपनी भावनाओं पर काबू रखते हैं, वो नहीं चाहते कि कोई भी उन्हें रोता हुआ देखे।
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क्या बताते हैं हमारे आंसू
किसी भी विषम परिस्थिति में पुरुष भले ही सबके सामने न रोए, लेकिन वह अकेले में चुपचाप रोता है या फिर अपने सबसे खास या विश्वास पात्र इंसान के सामने रोता है। रोना ये बताता है कि हम ताकतवर भावनाओं को महसूस कर रहे हैं। हमारे आंसुओं में ऑक्सीटोसिन नाम के रसायन होते हैं, जो इमोशनल बॉन्डिंग को बढ़ाने का काम करते हैं। लेकिन खासतौर पर पुरुष नहीं चाहते कि लोग उन्हें रोता हुआ देखें, लिहाजा ज्यादातर ने इस पर काबू पाना सीख लिया है। इससे यह संदेश जाता है कि पुरुष भावनात्मक तौर पर शून्य होते हैं या फिर अधिक कठोर होते हैं।
बचपन से ही ‘नहीं रोना’ सीख लेते हैं पिता
पुरुष अपने बचपन से ही अपने आस-पास के परिवेश के जरिए ये सीखते हैं कि ‘महिलाएं रोती हैं लेकिन पुरुष नहीं’। उनका दिमाग भी इस बात को आत्मसात कर लेता है और फिर हर परिस्थिति में उसी तरह से रिएक्ट करने लगता है। लेकिन यह उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है।
हमारे दिमाग के वो हिस्से जो शक्तिशाली भावनाओं को महसूस करते हैं और हमें उनसे निपटने की अनुमति देते हैं, लेकिन अगर हमने अपने दिमाग को बचपन से इस बात के लिए तैयार किया है कि पुरुष नहीं रोते तो दिमाग के वो हिस्से भावनाओं पर उस तरह महसूस करना बंद कर देते हैं। इससे मानसिक स्वास्थ्य पर बेहद बुरा प्रभाव पड़ता है।
भावनाओं को दबाने के आम कारण
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बचपन की कंडीशनिंग
जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, हमारा व्यवहार भी सामाजिक होता जाता है। हम अपने परिवार, दोस्तों और बड़ों में देखते हैं और फिर हम देखकर सीखने की प्रक्रिया से सामाजिक व्यवहार सीखते हैं और अपने आसपास के पुरुषों को देखकर अपनी भावनाओं को सप्रेस करना सीख जाते हैं।
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समाज की उम्मीदें
हमारे समाज में रोने को कमजोरी की निशानी माना जाता है। इस सोच के कारण पुरुषों को अपनी भावनाएं – खासकर दुख या उदासी – रोकर जाहिर करने से रोका जाता है। अगर लंबे समय तक इसे नजर अंदाज किया जाए, तो इससे अनसुलझे इमोशन हावी होने लगते हैं।
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मुश्किल हालात
कई बार जिंदगी में हमें ऐसे हालात का सामना करना पड़ता है जो बहुत तनावपूर्ण होते हैं और हमारे काबू से बाहर होते हैं। ऐसे हालात में खासकर जब परिवार या अपनों की बात हो, पुरुष अपनी भावनाएं जाहिर नहीं करते और अपने आस-पास के लोगों को हिम्मत देने और उनका सहारा बनने की कोशिश में अपनी भावनाओं को छिपा लेते हैं।
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कम इमोशनल इंटेलिजेंस
जो लोग अपनी भावनाओं के बारे में नहीं जानते या उन्हें जाहिर नहीं कर पाते, वे अक्सर अपनी भावनाओं को दबा लेते हैं। ये दबी हुई भावनाएं बाद में गुस्से और निराशा के रूप में सामने आती हैं। अक्सर लोग दूसरों पर गुस्सा निकालते हैं, हिंसक हो जाते हैं या गलत तरह का व्यवहार करने लगते हैं।
