
मध्यप्रदेश के बालाघाट में आदिवासी 'मड़मिंग' के शादी, फोटो-सोशल मीडिया
Madhya Pradesh Tribe Wedding Rituals: मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले की गोंड और बैगा जनजातियां अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए जानी जाती हैं। यहां होने वाली ‘मड़मिंग’ (शादी) आम हिंदू रीति-रिवाजों से बिल्कुल जुदा है। सादगी और परंपराओं से भरी इन शादियों में न तो पंडित की जरूरत होती है और न ही किसी शुभ मुहूर्त की।
बालाघाट की जनजातियों में शादी के लिए ‘मड़मिंग’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता है और दूल्हा-दुल्हन को स्थानीय भाषा में ‘नवड़ा-नवड़ी’ कहा जाता है। यहां शादी की शुरुआत किसी ज्योतिषीय गणना या मुहूर्त देखकर नहीं, बल्कि ‘परैया’ नामक मिट्टी की थाली में चावल डालकर की जाती है। दोनों परिवार एक साथ बैठकर परैया में चावल डालते हैं और रिश्ता पक्का करते हैं। इसके बाद गांव के पंचों को सामूहिक भोज दिया जाता है, जो समाज की ओर से इस रिश्ते को औपचारिक स्वीकृति का प्रतीक होता है।
इस अनोखी शादी को संपन्न कराने के लिए किसी ब्राह्मण की आवश्यकता नहीं होती। इसके बजाय, ‘भुमका’ या ‘मुठवा’ नामक आदिवासी पंडा पूरे विवाह का संचालन करते हैं। आधुनिकता के दौर में जहां शादियों में लाखों खर्च होते हैं, वहीं यहां पुजारी की दक्षिणा मात्र 12 रुपये होती है। ये पुजारी ‘सल्ला और घाघरा’ की पूजा कराते हैं, जिन्हें आदिवासी समाज में बेहद पवित्र माना जाता है।
‘मड़मिंग’ यानी शादी की पूरी प्रक्रिया में ‘टोटम’ नामक पारंपरिक वाद्य यंत्र की केंद्रीय भूमिका होती है। यह टोटम किसी पक्षी, पशु या पेड़ से जुड़ा एक सांस्कृतिक प्रतीक होता है, जिसे ‘गोटुल’ से लाया जाता है। गौरतलब है कि गोटुल आदिवासी संस्कृति में युवाओं को शिक्षा और संस्कार देने वाली एक पारंपरिक संस्था है। शादी की शुरुआत से लेकर अंत तक टोटम की आवाज गूंजती रहती है।
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विवाह का सबसे रोमांचक और अंतिम चरण ‘चिकल मांदी’ नामक रस्म होती है। जब शादी की सभी रस्में पूरी हो जाती हैं, तब दूल्हा-दुल्हन मंडप के नीचे खड़े होते हैं और उन पर पहले जल अर्पित किया जाता है। इसके बाद, वे एक-दूसरे के साथ कीचड़ (चिकल) से होली खेलते हैं। यह अनोखी रस्म न केवल विवाह की पूर्णता का प्रतीक है, बल्कि यह आदिवासी जीवन के सरल, सजीव और प्रकृति से जुड़े सामूहिक स्वरूप को भी उजागर करती है।






