

Why Shyama Prasad Mukherjee Left Nehru Cabinet: भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 6 अप्रैल 1950 को आजाद भारत के पहले उद्योग और आपूर्ति मंत्री के रूप में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था। यह एक ऐसा साहसी कदम था, जो किसी के लिए भी आम बात नहीं थी। क्योंकि उस वक्त नेहरू कैबिनेट में शामिल होना ही बेहद गौरव की बात मानी जाती थी, तब डॉ. मुखर्जी ने अपने सिद्धांतों और देशहित के सवाल पर बिना कुछ सोचे-समझे एक झटके में मंत्री का पद छोड़ दिया। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास की वह सबसे पहली और बड़ी राजनीतिक घटना थी, जिसने देश की राजनीति की दिशा और दशा हमेशा के लिए बदल दी।
प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की कैबिनेट से खुद को अलग करने के बाद डॉ. मुखर्जी शांत नहीं बैठे। तब उन्हें एक बात समझ आई कि देश को कांग्रेस के सामने एक मजबूत राष्ट्रवादी राजनीति पार्टी की जरूरत है। इसी एहसास के साथ उन्होंने अक्टूबर 1951 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की मदद से 'भारतीय जनसंघ' की नींव रखी। यह जनसंघ वहीं है, जो आज भारतीय जनता पार्टी के रूप में देश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है और देश की सत्ता का बागडोर अपने हाथों में थामी हुई है।
हालांकि, सवाल उठता है कि जब हर कोई प्रधानमंत्री नेहरू के कैबिनेट का हिस्सा बनना चाह रहा था, तब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने मंत्रिमंडल से खुद को अलग क्यों किया? आखिर वो क्या वजह रही थी कि डॉ मुखर्जी को उस कांग्रेस पार्टी का त्याग करना पड़ा, जिसके जरिए उन्होंने भारत के लिए आजादी की लड़ाई लड़ी। डॉ. मुखर्जी के कांग्रेस और नेहरू कैबिनेट छोड़ने के पीछे मुख्य वजह थी- 'नेहरू-लियाकत समझौता', जिसे दिल्ली पैक्ट के नाम से भी जाना जाता था। लेकिन इस समझौते में ऐसा क्या था, जो डॉ मुखर्जी को मंत्रिमंडल से हटने के लिए मजबूर कर दिया? आइए उन सभी पहलुओं को इस एक्सप्लेनर के जरिए विस्तार से समझते हैं।
इस पूरे मामले को समझने को लिए हमें थोड़ा इतिहास को जानना होगा। 1947 में भारत के दो हिस्सों में बंटवारे के बाद पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) और पश्चिमी पाकिस्तान में रह रहे हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसा और अत्याचार की घटनाएं हो रही थीं। विशेष रूप से बंगाल में हिंदुओं के नरसंहार, जबरन धर्म परिवर्तन और महिलाओं के साथ क्रूरता की खबरें लगातार आ रही थीं। इन हालातों को लेकर डॉ. मुखर्जी बेहद चिंतित और आक्रोशित थे।
इस संकट को टालने के लिए तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के बीच दिल्ली में एक समझौता हुआ। इस समझौते के तहत दोनों देशों ने वादा किया कि वे अपने-अपने देश में अल्पसंख्यकों (भारत में मुसलमानों और पाकिस्तान में हिंदुओं/सिखों) की सुरक्षा, संपत्ति और अधिकारों की पूरी गारंटी देंगे।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी पूरी तरह से 'नेहरू-लियाकत समझौते' के खिलाफ थे। उनका मानना था कि यह समझौता पूरी तरह एकतरफा और खोखला है। उनके विरोध की मुख्य बातें ये थीं-
जब जवाहरलाल नेहरू ने इस समझौते पर आगे बढ़ने का फैसला किया, तो डॉ. मुखर्जी ने कैबिनेट की बैठकों में अपनी असहमति दर्ज कराई। जब बात नहीं बनी, तो उन्होंने कैबिनेट से अलग होना ही बेहतर समझा। 6 अप्रैल 1950 को इस्तीफा देने के बाद, 19 अप्रैल 1950 को उन्होंने संसद में अपना ऐतिहासिक बयान पढ़ा। उन्होंने साफ कहा कि मेरी धारणा है कि पाकिस्तान की सरकार का मुख्य उद्देश्य हिंदुओं को पूरी तरह से खत्म करना या उन्हें देश से बाहर निकालना है। ऐसे में यह समझौता केवल एक दिखावा है जो लोगों को धोखे में रखता है।
नेहरू कैबिनेट से हटने के बाद डॉ. मुखर्जी शांत नहीं बैठे। उन्होंने महसूस किया कि देश को कांग्रेस के सामने एक मजबूत राष्ट्रवादी विकल्प की जरूरत है। इसी सोच के साथ उन्होंने अक्टूबर 1951 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सहयोग से 'भारतीय जनसंघ' की स्थापना की। यही भारतीय जनसंघ आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी के रूप में सामने आया, जो आज देश की सत्ता पर काबिज है।