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RJD Foundation Day: 29 साल में फर्श से अर्श और फिर…, क्या तेजस्वी यादव बदल पाएंगे राजद की किस्मत?
- Written By: मनोज आर्या
Rashtriya Janta Dal: लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में गठित राजद आज अपने स्थापना के बाद के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। एक समय चुनाव आयोग ने राजद को एक 'राष्ट्रीय पार्टी' का दर्जा दिया था।

क्या तेजस्वी बदल पाएंगे राजद की किस्मत? (AI जेनरेटेड इमेज)
Rashtriya Janta Dal Foundation Day: बिहार की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टियों में से एक राष्ट्रीय जनता दल (RJD) आज 5 जुलाई को अपना 30वां स्थापना दिवस मना रही है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में गठित राजद आज अपने स्थापना के बाद के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। एक समय था जब चुनाव आयोग ने राजद को एक ‘राष्ट्रीय पार्टी’ का दर्जा दिया था। हालांकि, मौजूदा समय में यह सिर्फ के क्षेत्रीय पार्टी बनकर रह गई है। 2025 के विधानसभा चुनावों में उम्मीदों से खराब प्रदर्शन ने पार्टी के भविष्य और रणनीति पर भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
राष्ट्रीय जनता दल का सपोर्ट बेस पारंपरिक रूप से अन्य पिछड़ा वर्ग, दलित और मुस्लिम रहा है और इसे निचली जातियों का पॉलिटिकल चैंपियन माना जाता है। 2008 में, उत्तर-पूर्वी राज्यों में अपने प्रदर्शन के बाद राजद को राष्ट्रीय स्तर की पार्टी के तौर पर मान्यता मिली। लेकिन करीब दो साल बाद 30 जुलाई 2010 को चुनाव आयोग ने आरजेडी की राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर मान्यता खत्म कर दी।
कैसे हुई थी आरजेडी की शुरुआत?
चर्चित चारा घोटाले में आरोप पत्र दाखिल होने के बाद जनता दल के अंदर और बाहर लालू यादव पर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने का दबाव था। तब 5 जुलाई 1997 को पप्पू यादव, रघुवंश प्रसाद सिंह, मोहम्मद शहाबुद्दीन, अब्दुल बारी सिद्दीकी, कांति सिंह, मोहम्मद तस्लीमुद्दीन और मोहम्मद अली अशरफ फातमी ने 17 लोकसभा सांसदों और आठ राज्यसभा सांसदों के समर्थन के साथ दिल्ली में नई राजनीतिक पार्टी राष्ट्रीय जनता दल का गठन हुआ। यह जनता दल से अलग होकर बनी थी। लालू प्रसाद राजद के पहले अध्यक्ष चुने गए।
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सीएम पद से लालू यादव का इस्तीफा
मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे की मांग लगातार बढ़ने के बाद 25 जुलाई को लालू यादव ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया, लेकिन उसी दिन अपनी पत्नी राबड़ी देवी को बिहार के नए मुख्यमंत्री बनाने में सफल रहे। मार्च 1998 के आम चुनावों में राजद ने बिहार में 17 लोकसभा सीटें जीतीं, लेकिन बिहार से बाहर अन्य राज्यों में पार्टी का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। उसी साल बाद में राजद ने मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी के साथ एक एंटी भारतीय जनता पार्टी सेक्युलर गठबंधन बनाया, लेकिन गठबंधन को कोई बड़ा सपोर्ट नहीं मिला और पार्टी 1999 के लोकसभा चुनावों में सिर्फ 7 सीटें ही जीत पाई।
राजद सुप्रीमो लालू यादव की तस्वीर, (सोर्स- सोशल मीडिया)
1999 में कांग्रेस-राजद के बीच गठबंधन
अक्टूबर 1999 के चुनाव में, RJD ने इंडियन नेशनल कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा, लेकिन लालू प्रसाद यादव की सीट समेत 10 लोकसभा सीटें हार गई। हालांकि, 2000 के बिहार चुनाव में इसने अच्छा परफॉर्म किया और बिहार विधानसभा की ज्यादातर सीटें जीतीं। इसने कांग्रेस के साथ पोस्ट पोल अलायंस करके और राज्य के बंटवारे पर सहमत होकर बहुमत हासिल की। चुनावी किस्मत में अपनी बढ़त जारी रखते हुए राजद ने 2004 के चुनावों में 24 लोकसभा सीटें जीतीं, जो इसने इंडियन नेशनल कांग्रेस के साथ मिलकर लड़े थे। यह 2004 से मई 2009 तक इंडियन नेशनल कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस (UPA) का हिस्सा थी, जिसमें लालू यादव रेल मंत्री थे।
2005 विधानसभा चुनाव का प्रदर्शन
फरवरी 2005 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में राजद ने सिर्फ 75 सीटें जीतीं और सत्ता से हाथ गंवा बैठी। उसी साल अक्टूबर में हुए राज्य के विधानसभा चुनावों में कोई भी पार्टी सरकार नहीं बना पाई। हालांकि, राजद सिर्फ 54 सीटें ही जीत पाई। 2009 के आम चुनाव में सीट शेयरिंग की बातचीत फेल होने पर RJD ने UPA से अपना गठबंधन तोड़ लिया। राजद ने रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी और मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी के साथ अपना गठबंधन बनाया, जिसे मीडिया ने ‘चौथा मोर्चा’ करार दिया।
दिवंगत नेता राम विलास पासवान और लालू प्रसाद यादव, (सोर्स- सोशल मीडिया)
हालांकि, इस चुनाव में भी राजद को प्रयोग असलफर रहा और पार्टी किसी भी तरह बिहार में सिर्फ चार सीटों पर ही जीत दर्ज कर सकी। हालांकि, 2010 के विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल ने मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी के साथ अपना गठबंधन तोड़ दिया। 2014 के आम चुनाव में लालू यादव की नेतृत्व वाल राजद UPA में वापस आ गई और बिहार में इंडियन नेशनल कांग्रेस और नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ी। बिहार की 40 सीटों में से राजद 27 सीटों पर चुनाव लड़ी, जबकि इंडियन नेशनल कांग्रेस 12 और NCP एक सीट पर चुनाव लड़ी थी।
2015 में नीतीश-लालू का गठबंधन
7 मई 2015 को राजद ने अपने पुराने और कद्दावर नेता पप्पू यादव को पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण छह साल के लिए निष्कासित कर दिया। जब अटकलें लगाई गईं कि वह 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के लिए बीजू जनता दल में शामिल हो सकते हैं, लेकिन उन्होंने जन अधिकार पार्टी के नाम एस एक नई पार्टी बनाई। 2015 के विधानसभा चुनाव में राजद-जदयू और कांग्रेस ने महागंठन बनाया।
इस चुनाव में राजद 80 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बन गई, उसके बाद जनता दल (यूनाइटेड) 71 सीटों के साथ दूसरे सबसे बड़ी पार्टी। जबकि, भाजपा 53 सीटों के साथ तीसरे और कांग्रेस 27 सीटों के चौथे नंबर पर रही। जनता दल (यूनाइटेड) के नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने और लालू यादव के बेटे तेजस्वी यादव बिहार के उपमुख्यमंत्री बने।
2017 में जब नीतीश ने राजद को छोड़ा
जुलाई 2017 में तेजस्वी यादव के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों के बाद नीतीश कुमार ने तेजस्वी यादव को मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने के लिए कहा, जिसे राजद ने मानने से इनकार कर दिया। भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी साफ छवि बचाने के लिए नीतीश कुमार ने 26 जुलाई 2017 को इस्तीफा दे दिया, जिसके बाद राजद सरकार से बेदखल हो गई। इसके बाद BJP और जेडीयू का गठबंधन हुआ, जिसके नतीजे में नीतीश कुमार फिर से मुख्यमंत्री बने जबकि बीजेपी के दिवंगत नेता सुशील मोदी डिप्टी मुख्यमंत्री बने।
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को गले लगाते राजद सुप्रीमो लालू यादव, (सोर्स- सोशल मीडिया)
जनवरी 2024 में नीतीश कुमार ने एक बार फिर महागठबंधन छोड़ दिया और BJP से हाथ मिला लिया। बाद में वह एक बार फिर मुख्यमंत्री बने। 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में RJD को सिर्फ 25 सीटें मिलीं और वह राज्य की तीसरी पार्टी बन गई। राजद के सहयोगी पार्टियों- कांग्रेस और वाम दलों को सिर्फ10 सीटें मिलीं।
क्या RJD की किस्मत बदल पाएंगे तेजस्वी?
भविष्य की बात करें तो तेजस्वी यादव के लिए अपनी राजनीतिक जमीन वापस पाना इस बात पर निर्भर करेगा कि वह पार्टी के संगठन को ब्लॉक और बूथ स्तर पर कितना मजबूत कर पाते हैं। उन्हें न केवल अपने पुराने वोट बैंक को एकजुट रखना होगा, बल्कि अति पिछड़ी जातियों (EBC) और दलितों के बीच भी अपनी पैठ बढ़ानी होगी। मुख्यमंत्री के रूप में भाजपा नेता सम्राट चौधरी के उभार और राज्य की बदलती राजनीतिक कशमकश के बीच तेजस्वी यादव को जमीन पर उतरकर एक नए और आक्रामक नैरेटिव के साथ जनता के बीच जाना होगा।
ये भी पढ़ें: राजद के 30 साल: लालू का हुंकार, सामाजिक न्याय से संविधान की रक्षा तक संघर्ष और तेज होगा
तेजस्वी में आरजेडी की किस्मत बदलने का माद्दा जरूर है, लेकिन इसके लिए उन्हें चुनावी रणनीतियों में बड़े बदलाव और नए सामाजिक गठबंधनों को साधने की कड़ी परीक्षा से गुजरना होगा। बिहार विधानसभा के हालिया चुनावों में आरजेडी को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा और पार्टी सीटों के मामले में काफी पीछे छूट गई।
Rashtriya janta dal 30th foundation tejashwi yadav can changed rjd explained
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