वो फौज जिससे हिल गया था ब्रिटिश राज, 15 साल की उम्र में ही नेताजी ने बता दिया था, अब अंग्रेजों की खैर नहीं

Subhas Chandra Bose: आजाद हिंद फौज ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में एक अमिट छाप छोड़ी। इसके सैनिकों की वीरता और बलिदान ने भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वालों में नई ऊर्जा और उत्साह का संचार किया।
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नेताजी सुभाष चंद्र बोस
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Netaji Subhas Chandra Bose Jayanti: आज देशभर में ‘पराक्रम दिवस’ मनाया जा रहा है। 23 जनवरी 1897 को जन्मे नेताजी सुभाष चंद्र बोस केवल एक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि एक क्रांतिकारी सोच थे। उन्होंने अंग्रेजों की सत्ता को सीधी चुनौती देते हुए साफ कहा था कि भारत अब गुलामी में नहीं रह सकता। उनका दृढ़ विश्वास था कि आज़ादी कभी भीख में नहीं मिलती, उसे संघर्ष से हासिल करना पड़ता है।

नेताजी का विजन इतना प्रखर था कि उसने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी। उनका कहना था कि गुलामी की बेड़ियों को तोड़ने के लिए दिल में आग और प्राणों में संकल्प होना चाहिए। भूख हो या मृत्यु, उनके लिए लक्ष्य सिर्फ एक था स्वतंत्र भारत। आज उनके जन्मदिन पर हम उसी जज़्बे को नमन कर रहे हैं, जिसने पूरी दुनिया को भारत की शक्ति का एहसास कराया।

15 साल की उम्र में मां से पूछा था वो सवाल

कटक में जन्मे सुभाष बाबू बचपन से ही अलग सोच रखते थे। महज 15 वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी मां से ऐसा प्रश्न किया, जो आज भी रोंगटे खड़े कर देता है। उन्होंने पूछा था कि इस स्वार्थी दौर में कितने बेटे अपनी मां के लिए सब कुछ त्याग सकते हैं? यही भावना थी जिसने उन्हें 1921 में इंडियन सिविल सर्विस जैसी प्रतिष्ठित नौकरी को ठुकराने का साहस दिया। उन्होंने अपने भाई शरत को लिखा था कि त्याग और कष्ट की धरती पर ही किसी राष्ट्र का निर्माण होता है।

जेब में गीता, मन में ध्यान

नेताजी जितने कठोर दिखते थे, भीतर से उतने ही आध्यात्मिक भी थे। युद्ध के कठिन हालात में भी वे अपनी संस्कृति से जुड़े रहे। 1945 में युद्ध के भयावह समय में भी उनकी वर्दी की जेब में हमेशा ‘भगवद गीता’ रहती थी। रात के सन्नाटे में वे ध्यान करते थे और उपनिषदों से त्याग और कर्तव्य की सीख लेते थे। उनका संकल्प था कि आखिरी सांस तक आज़ादी की पवित्र लड़ाई जारी रहेगी।

जब बनी आज़ाद हिंद सरकार

21 अक्टूबर 1943 का दिन भारतीय इतिहास में स्वर्णिम अध्याय है। इसी दिन सिंगापुर में नेताजी ने ‘आज़ाद हिंद सरकार’ की स्थापना की और देश के पहले राष्ट्राध्यक्ष बने। यह सरकार केवल प्रतीकात्मक नहीं थी। जापान, जर्मनी और इटली सहित 10 से अधिक देशों ने इसे मान्यता दी। आज़ाद हिंद फौज ने कई मोर्चों पर अंग्रेजों को कड़ी चुनौती दी और देश के बड़े हिस्से को मुक्त कराया।

लाल किला ट्रायल से हिला ब्रिटिश राज

आज़ाद हिंद फौज के सैनिकों के बलिदान ने पूरे देश को झकझोर दिया। जब इन वीरों पर लाल किले में मुकदमा चला, तो पूरा भारत एकजुट हो गया। इसी ने अंग्रेजों को यह समझा दिया कि अब भारत पर शासन करना संभव नहीं रहा। नेताजी का विश्वास था कि हमारी जीत निश्चित है। आज का दिन उन्हीं अमर सपूतों के अदम्य साहस और बलिदान को सलाम करने का दिन है।

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