शाही जामा मस्जिद या हरिहर मंदिर? संभल विवाद पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, मुस्लिम पक्ष ने दायर की है याचिका

Harihar Temple Claim: संभल की शाही जामा मस्जिद विवाद पर आज सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई। मस्जिद समिति ने चंदौसी कोर्ट के सर्वे आदेश को दी है चुनौती। जस्टिस पीएस नरसिम्हा की बेंच करेगी मामले पर विचार।
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संभल की शाही जामा मस्जिद (Image- Social Media)
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Sambhal Shahi Jama Masjid Controversy: सुप्रीम कोर्ट आज मुस्लिम पक्ष की ओर से दायर एक याचिका पर सुनवाई करेगा, जिसमें उत्तर प्रदेश के संभल जिले में स्थित शाही जामा मस्जिद के लिए चंदौसी कोर्ट की ओर से जारी सर्वेक्षण आदेश को चुनौती दी गई है। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर जारी 'कॉज लिस्ट' के अनुसार, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच 20 अप्रैल को इस मामले की सुनवाई करेगी।

यह याचिका मस्जिद समिति ने दायर की है। इसमें शाही जामा मस्जिद को लेकर चल रहे विवाद के संबंध में सर्वे के आदेश का विरोध किया गया है। हिंदू वादियों का दावा है कि यह मस्जिद पहले से मौजूद एक मंदिर के ढांचे के ऊपर बनाई गई थी।

सर्वेक्षण की कार्यवाही पर रोक लगाने से किया था इनकार

इससे पहले, शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा सर्वेक्षण की कार्यवाही पर रोक लगाने से इनकार करने को चुनौती देने वाली एक विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) पर सुनवाई करते हुए हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों को विवादित स्थल पर यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया था। यह विवाद हिंदू पक्ष के इस दावे से जुड़ा है कि मस्जिद एक प्राचीन हरिहर मंदिर के अवशेषों पर बनी है, जिसे कथित तौर पर मुगल काल में ढहा दिया गया था। दूसरी ओर, मस्जिद समिति ने इस मुकदमे की स्वीकार्यता पर सवाल उठाया है और जिस तरीके से सर्वेक्षण का आदेश दिया गया, उस पर आपत्ति जताई है।

कार्यवाही पर रोक लगाने की मांग

इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा से चंदौसी ट्रायल कोर्ट के उस निर्देश को सही ठहराए जाने के बाद विवाद और गहरा गया, जिसमें स्थल का सर्वेक्षण करने की अनुमति दी गई थी। कोर्ट ने इस आदेश में कोई भी कानूनी खामी नहीं पाई। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी मस्जिद समिति की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें कार्यवाही पर रोक लगाने की मांग की गई थी। इसके बाद, मस्जिद समिति ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और यह दलील दी कि सर्वेक्षण का आदेश उसे अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर दिए बिना और स्थापित कानूनी सिद्धांतों का उल्लंघन करते हुए पारित किया गया था।

क्या है दोनों पक्षों की दलील

यह मामला 'पूजा स्थल अधिनियम, 1991' के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है, जो पूजा स्थलों के स्वरूप परिवर्तन पर रोक लगाता है और यह अनिवार्य करता है कि उनका धार्मिक स्वरूप वैसा ही बना रहे, जैसा वह 15 अगस्त, 1947 को था।

हालांकि, हिंदू पक्ष का तर्क है कि यह विवाद इस अधिनियम के दायरे से बाहर है और इसके लिए वह 'प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958' के प्रावधानों का हवाला देता है।

शाही जामा मस्जिद विवाद को लेकर पहले भी तनाव देखने को मिला था। अदालत के आदेश पर हुए एक सर्वे के दौरान संभल में हिंसा भड़क उठी थी, जिसमें कई लोगों की जान चली गई थी। अदालत के सामने अपनी दलीलों में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने कहा है कि शाही जामा मस्जिद केंद्र द्वारा संरक्षित स्मारक है और सहायक रिकॉर्ड की गैर-मौजूदगी में इसे सार्वजनिक पूजा स्थल के तौर पर नहीं माना जा सकता। -एजेंसी इनपुट के साथ

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