नेपाली PM की तानाशाही! बालेन शाह सरकार पर सुप्रीम कोर्ट के 3 जजों को धमकाने का आरोप, मचा बवाल

Balen Shah News: बालेन शाह पर न्यायपालिका और संवैधानिक नियुक्तियों में राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप लगे हैं। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने अदालतों की स्वतंत्रता पर गंभीर चिंता जताई है।
Nepal PM Balen Shah
बालेन शाह सरकार पर लगे गंभीर आरोप (सोर्स- सोशल मीडिया)
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Balen Shah Threatening Judges: बालेन शाह ने जब से नेपाल के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ली है, उनके फैसलों को लेकर कई बार विवाद हो चुका है। इसी बीच नेपाली प्रधानमंत्री एक बार फिर विवादों में फंसते नजर आ रहे हैं। उन पर न्यायपालिका में राजनीतिक दखल बढ़ाने के आरोप लगे हैं। इसके चलते बालेन शाह की न सिर्फ नेपाल में बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट्स वॉच और इंटरनेशनल कमीशन ऑफ जूरिस्ट्स (ICJ) ने संयुक्त बयान जारी कर कहा कि नेपाल सरकार के हालिया फैसले अदालतों की स्वतंत्रता को कमजोर कर सकते हैं। संगठनों का कहना है कि यदि न्यायपालिका पर राजनीतिक प्रभाव बढ़ा तो कानून का शासन और लोकतांत्रिक व्यवस्था दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

कॉन्स्टिट्यूशनल काउंसिल एक्ट संशोधन पर आपत्ति

मानवाधिकार संगठनों ने सरकार द्वारा कार्यकारी आदेश (ऑर्डिनेंस) के जरिए 'कॉन्स्टिट्यूशनल काउंसिल एक्ट' में किए गए संशोधन पर भी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि इतने महत्वपूर्ण कानून में संसद के बजाय ऑर्डिनेंस से बदलाव करना संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है। इससे मुख्य न्यायाधीश सहित कई अहम संवैधानिक पदों पर नियुक्तियों की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो गए हैं।

द काठमांडू पोस्ट के मुताबिक, संशोधन के बाद संवैधानिक परिषद के कोरम और वोटिंग से जुड़े नियम बदल दिए गए हैं। यही परिषद मुख्य न्यायाधीश और अन्य संवैधानिक अधिकारियों की नियुक्ति की सिफारिश करती है। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि परिषद में पहले से ही सरकार का बहुमत है, इसलिए नए नियम न्यायिक नियुक्तियों पर राजनीतिक प्रभाव बढ़ा सकते हैं।

मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति पर विवाद

संगठनों ने मनोज कुमार शर्मा को मुख्य न्यायाधीश बनाए जाने पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि नेपाल में लंबे समय से सबसे वरिष्ठ कार्यरत न्यायाधीश को मुख्य न्यायाधीश बनाने की परंपरा रही है। लेकिन इस बार उस परंपरा का पालन नहीं किया गया। साथ ही, उनके नामांकन के खिलाफ दर्ज शिकायतों की सार्वजनिक और निष्पक्ष जांच भी नहीं कराई गई। जबकि मनोज कुमार से सीनियर जज पहले से मौजूद हैं।

नेपाल के संविधान के अनुसार, किसी जज के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होते ही वह स्वतः निलंबित हो जाता है, जब तक संसद अंतिम फैसला नहीं ले लेती। मानवाधिकार संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जजों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई होती है, तो अदालत के कामकाज पर गंभीर असर पड़ सकता है। खासकर तब, जब सुप्रीम कोर्ट सरकार के फैसलों और संवैधानिक मामलों से जुड़ी महत्वपूर्ण याचिकाओं की सुनवाई कर रहा है।

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