यहां प्याज को 'लड्डू राम' तो मिर्च को कहते है लंका, महाकुंभ में हुई अनोखी भोजन व्यवस्था की शुरुआत

महाकुंभ नगर में भोजन की अनोखी व्यवस्थाएं की गई है जिन्हें सुनकर आप दंग रह जाएंगे। दरअसल निशुल्क सेवा देते हुए भोजन, भंडारे की व्यवस्था साधुओं के लिए शुरु हो गई है।
महाकुंभ 2025, भोजन की व्यवस्था
महाकुंभ में भोजन की व्यवस्था (सौ.सोशल मीडिया)
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Maha Kumbh 2025: दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन यानि महाकुंभ उत्तरप्रदेश के प्रयागराज यानि महाकुंभ नगर में 10 दिनों बाद शुरु होना वाला है वहीं पर इसे लेकर प्रशासन ने सारी व्यवस्थाएं पूरी कर ली है। इस महाकुंभ में शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु और नागा साधु पहुंचने लगे है। इसे देखते हुए महाकुंभ नगर में भोजन की अनोखी व्यवस्थाएं की गई है जिन्हें सुनकर आप दंग रह जाएंगे। दरअसल निशुल्क सेवा देते हुए भोजन, भंडारे की व्यवस्था साधुओं के लिए शुरु हो गई है।

भोजन के साथ जोड़ेंगे भगवान राम का नाम

यहां पर महाकुंभनगर में भोजन व्यवस्था की जानकारी देते चले तो, अखाड़े के शिविर में पंगत के द्वारा लोगों को खाा परोसा जाएगा। यहां पर सेवकों द्वारा हाथों में खाने की बाल्टी लिए भोजन के नाम के साथ भगवान राम का नाम लिया जाएगा। जिसके चलते पूरे प्रांगण का माहौल रामामय होने वाला है। इन भंडारों में परोसने के दौरान सेवक पुड़ी राम, दाल राम, लंका राम कहे जा सकते है। वहीं पर पानी को बड़े ही विचित्र ढ़ंग में पानी राम या पाताल मेवा कहते है। इसके अलावा यहां पर प्याज जो तामसिक श्रेणी का भोजन है इसे रसोई में प्रतिबंधित किया गया है। इसे लड्डू राम और मिर्च को लंका कहा जाता है।

कई सालों से चली आ रही है परंपरा

इस खास भोजन व्यवस्था को लेकर दत्त गिरी नागा बाबा आवाहन अखाड़ा ने जानकारी दी है। इस दौरान कहा कि, "हम अन्नपूर्णा माता की रसोई में जो भी चीज बनाते हैं, वहां सबसे पहले भगवान को भोग लगाते हैं. वह प्रसाद भगवान के नाम पर होता है इसलिए हम उसमें भगवान का नाम जोड़ते हैं. ऐसा करने से हर चीज अमृत बन जाती है. यह हिंदुस्तान और सनातन की संस्कृति का हिस्सा है और हमारे गुरु ने हमें यह सिखाया है. संतों में प्राचीन काल से यह परंपरा है. जल को पाताल मेवा भी कहा जाता है. यह परंपरा आदि गुरु शंकराचार्य के समय से है।"

इतना ही नहीं परंपरा में यह भी बताया गया है कि, भोग प्रसाद मतलब देवी-देवताओं को भोग लगा हुआ भोजन जो भोग लगने के बाद प्रसाद हो जाता है. साधु संतो के शिविरों में इष्ट-देव और देवी देवताओं को भोग लगाया जाता है और उसी भोग को तैयार भोजन में मिला दिया जाता है, जिसके बाद भोजन 'भोग प्रसाद' हो जाता है।

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