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Explainer : महाकुंभ 2025 को ये चार ग्रह बना रहे हैं खास, ऐसी है 144 साल वाले दावे की सच्चाई
- Written By: विकास कुमार उपाध्याय
कुंभ मेले का इतिहास आठवीं सदी के हिंदू दार्शनिक आदि शंकराचार्य से जुड़ा हुआ है, जिन्होंने आध्यात्मिक नेताओं और तपस्वियों की नियमित सभाओं को प्रोत्साहित किया था। उन्होंने मठ प्रणाली और 13 अखाड़ों की भी शुरुआत की थी, जो...

महाकुंभ 2025, डिजाइन फोटो
नवभारत एक्सप्लेनर डेस्क : दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक समागम महाकुंभ मेला उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में आज यानी सोवार 13 जनवरी से शुरू हो रही है, जो 26 फरवरी तक चलेगी। संगम में पवित्र स्नान के लिए शहर में आने वाले हिंदू श्रद्धालुओं के लिए यह समागम बहुत महत्व रखता है।
बता दें, 45 दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में दुनिया भर से 40 करोड़ से ज्यादा तीर्थयात्रियों और श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद जताई जा रही है। यह धार्मिक समागम संस्कृति, परंपरा और आध्यात्मिकता का संगम है। ऐसे में आज के इस एक्सप्लेनर में समझेंगे कि आखिर 144 साल बाद ही क्यों महाकुंभ का आयोजन किया जाता है और कुंभ कितने प्रकार के होते हैंष इसका महत्व क्य होता है? इन सब के बार में जानकारी पाने के लिए पढ़ लीजिए इस एक्सप्लेनर को अंत तक।
कुंभ मेले की उत्पत्ति कैसे हुई है?
कुंभ मेले का इतिहास आठवीं सदी के हिंदू दार्शनिक आदि शंकराचार्य से जुड़ा हुआ है, जिन्होंने आध्यात्मिक नेताओं और तपस्वियों की नियमित सभाओं को प्रोत्साहित किया था। उन्होंने मठ प्रणाली और 13 अखाड़ों की भी शुरुआत की थी, जो योद्धा वर्ग के भिक्षुओं और संतों का समूह हैं। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, कुंभ मेले की उत्पत्ति समुद्र मंथन या ब्रह्मांडीय महासागर के मंथन से जुड़ी हुई बताई जाती है। कंभ मेले की उत्पत्ति तह हुई, जब देवता और राक्षस अमृत या अमरता का अमृत प्राप्त करने के लिए एक साथ आए थे।
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हिंदू किंवदंतियों के अनुसार ऐसे हुई थी कुंभ मेले की उत्पत्ति
हिंदू किंवदंतियों का कहना है कि भगवान विष्णु ने मोहिनी का वेश धारण किया और राक्षसों से बचाने के लिए समुद्र मंथन के बाद अमृत का कलश ले लिया। एक युद्ध छिड़ गया, जिसके कारण अमृत की बूंदें चार स्थानों – प्रयागराज, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन में गिरीं। इन स्थानों में चार तीर्थ या पवित्र स्थल हैं और इनसे होकर बहने वाली नदियों – उज्जैन में क्षिप्रा नदी, नासिक की गोदावरी, हरिद्वार में गंगा और प्रयागराज में संगम में डुबकी लगाने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। प्रयागराज में गंगा, यमुना और पौराणिक सरस्वती नदियों जहां मिलान होता है उसे संगम कहा गया है।
कुंभ मेले के कितने प्रकार हैं?
कुंभ के चार अलग-अलग प्रकार हैं, जिसमें पूर्ण कुंभ मेला, अर्ध कुंभ मेला, कुंभ मेला और महा कुंभ मेला शामिल हैं। कुंभ मेला हर तीन साल में हरिद्वार, उज्जैन, नासिक और प्रयागराज में नदियों के तट पर बारी-बारी से आयोजित किया जाता है। अर्ध कुंभ मेला हर छह साल में हरिद्वार और प्रयागराज में आयोजित होता है। पूर्ण कुंभ मेला हर 12 साल में चार पवित्र स्थलों पर आयोजित किया जाता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु और तीर्थयात्री आते हैं। महाकुंभ मेला प्रयागराज में मनाया जाता है, जो 12 कुंभ मेला चक्रों के पूरा होने का प्रतीक है। 144 वर्षों में एक बार इसका आयोजन होता है। यह भव्य आयोजन अत्यधिक पवित्र होता है, जिसमें शाही स्नान या पवित्र डुबकी सबसे खास मानी जाती है।
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साल 2025 का महाकुंभ इसलिए है खास
2025 का महाकुंभ मेला विशेष महत्व रखता है क्योंकि यह 12 कुंभ मेला चक्रों के पूरा होने का प्रतीक है। इस साल के महाकुंभ के महत्व को समझाते हुए, टीकरमाफी आश्रम के प्रमुख महंत हरिचैतन्य ब्रह्मचारी ने मीडिया को बताया, “यह 144 साल बाद है कि सभी चार ग्रहों की स्थिति एक सीध में है, और अमावस्या (29 जनवरी) से तीन घंटे पहले महत्वपूर्ण रूप से ‘पुख (पुष्य भी) नक्षत्र भी चार ग्रहों के साथ संरेखित होगा। इस प्रकार पिछले 144 वर्षों में सभी महाकुंभ में सबसे शुभ 2025 में है। ये चार ग्रह सूर्य, चंद्रमा, बृहस्पति और शनि हैं। आपको बता दें कि कुंभ मेले की तिथियां हिंदू कैलेंडर के अनुसार चंद्रमा, सूर्य और बृहस्पति की चाल पर तय की जाती हैं।
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