Exclusive: EX CEC बोले- कैंडीडेट हारने के बाद कोर्ट जाएं और खामियां उजागर करें, दुनिया देखेगी कौन सही है?

OP Rawat Exclusive: पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने बंगाल में 91 लाख वोटर्स के नाम कटने पर चिंता जताई है। उन्होंने EVM को 'फुल प्रूफ' बताते हुए 'नवभारत' के पॉडकास्ट 'द लीडर' में जानें क्या कहा?
Speaking on the SIR issue, the former CEC stated: "Candidates should approach the courts after a defeat and expose any irregularities; the world will then see who is in the right."
ओपी रावत का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू नवभारत के साथ
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OP Rawat Exclusive Interview: पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने कहा कि बंगाल जैसे राज्य में 91 लाख वोटर्स एसआईआर से बाहर हुए हैं। ऐसे में हर किसी के मन में सवाल खड़ा हो गया है कि जो वोटर्स कटे हैं वह सही हैं या फिर गलत? क्योंकि अगर वो सही कटे हैं तो फिर पिछले चुनाव क्या गलत वोटर लिस्ट पर हुए हैं। ओपी रावत इस बात को 'नवभारत' के पॉडकास्ट 'द लीडर' में बात करते हुए कहा।

उन्होंने कहा, हमने गोल्ड स्टैंडर्ड के चुनाव कराए हैं। पूरी दुनिया हमारे सिस्टम को बेहतर मानती रही है, ऐसे में अगर कोई भी संदेह के बादल हैं तो उस पर स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए। ओपी रावत ने बंगाल चुनावों पर कहा, चुनाव के दौरान कैंडीडेट को ऐसे मतदाताओं की लिस्ट बनानी चाहिए, जिनका नाम एसआईआर में बाहर कर दिया गया है, उन्हें अपील का मौका नहीं मिला है या फिर उनकी अपील पर सुनवाई नहीं हो पाई है। अगर कैंडीडेट चुनाव हारें तो इस लिस्ट के साथ कोर्ट में अपील करें। पूरी दुनिया देखेगी कि आखिर गलती कहां हुई है और जिम्मेदार कौन है?

पूरा पॉडकास्ट यहांं देखें- 

पेश हैं, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत से बातचीत के प्रमुख अंश...

सवाल- क्या चुनाव आयोग वाकई में निष्पक्ष है?

जवाब- आपने बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है, जब एसआईआर और पश्चिम बंगाल चुनावों में जो कुछ हो रहा है, उस वक्त में आम आदमी भी कुछ यही सोच रहा है। जिस तरह का घटनाक्रम सामने आ रहा है, उसमें यह सवाल उठना वाजिब भी है। लोगों को भरोसा रखना चाहिए, इलेक्शन कमीशन ऐसे वक्त से भी निकलकर आया है, जब अंग्रेजों ने आजाद करते वक्त कहा था कि आप अपने देश को बर्बाद कर लेंगे।

जिस तरह से उस वक्त में पूरी मतदाता सूची तैयार की और अभी तक चुनाव कराते आ रहे हैं। हमने गोल्ड स्टेंडर्ड के चुनाव कराए हैं। ऐसे समय में हमें आशा रखनी चाहिए और उम्मीद भी कि चीजें ठीक ही होंगी। आने वाले कल में संशय के बादल छटेंगे।

सवाल- एसआईआर में नाम कट रहे हैं, क्या राजनीतिक फायदे और नुकसान के हिसाब से नाम काटे जा रहे हैं?

जवाब- यह सही मुद्दा है, अकेले बंगाल में ही 91 लाख वोट कट गए हैं। इससे लोगों को यह भी शक हो रहा है कि क्या पहले जो चुनाव हुए हैं, वह गलत मतदाता सूची पर हुए हैं। चीजें उठ रही हैं, लेकिन इसमें सुप्रीम कोर्ट शामिल है...पूरी प्रक्रिया को करीब से देख रहा है। ऐसे में हमें अपनी न्याय प्रक्रिया पर भरोसा रखना चाहिए कि आखिर में सब सही होगा।

सवाल- एसआईआर पूरी तरह से चुनाव आयोग की प्रक्रिया थी, इसमें सुप्रीम कोर्ट का शामिल होना, ऐसे में यह भरोसे का संकट खड़ा नहीं करता है?

जवाब- यह सही दिशा नहीं है। सभी के पॉवर अलग हैं। इसी तरह से इलेक्शन कमीशन का डोमेन पूरी तरह से अलग है, इसमें अभी तक कोई गया नहीं है। यह पहली बार है और ऐतिहासिक भी कि सुप्रीम कोर्ट इलेक्शन कमीशन की प्रक्रिया के बीच में आया है। ज्यूडिशरी ने इसमें लोग तय किए हैं वह तय करेंगे कि आपका नाम मतदाता सूची में रहेगा या नहीं रहेगा।

अपील सुनने के लिए अपीलेट बना दिए, जबकि कानून में इसकी कोई व्यवस्था ही नहीं है। कानून कहता है कि इस प्रक्रिया में एआरओ, फिर डिस्ट्रिक इलेक्शन आॅफिसर और फिर सीईओ को अपील जाएगी, उन्हीं को उसका निस्तारण भी करना होता है। इसमें कोर्ट की भूमिका कहीं नहीं है। समय था नहीं और अविश्वास बढ़ रहा था ऐसे में शायद सुप्रीम कोर्ट को शामिल होना पड़ा है। अब क्या परिणाम सामने आएंगे, यह देखना होगा।

सवाल- विवादित एसआईआर सूची पर चुनाव हो रहे हैं, ऐसे में जिन मतदाताओं का नाम सूची से कटा है, तो क्या हम उन्हें उनके मताधिकार से वंचित नहीं कर रहे?

जवाब- जो कैंडीडेट हैं, उन्हें मेहनत करनी होगी। उन लोगों की सूची बनाएं, जिनके नाम कटे हैं और दस्तावेज सही हैं। उनकी अपील सुनी नहीं गई या फिर निस्तारण नहीं हुआ है। अगर वो चुनाव हारें तो सीधे इस सूची के साथ कोर्ट में जाएं। उनकी बात सुनी जाएगी। इससे सिस्टम की खामियां पूरी तरह से उजागर होंगी और पूरी दुनिया को हमारे सिस्टम के बारे में पता चलेगा किसने क्या किया है और इसके लिए दोषी कौन है।

सवाल- अगर इतनी संख्या में प्रत्याशी कोर्ट में जाएंगे तो क्या पूरी चुनाव प्रक्रिया ही सवालों के घेरे में नहीं आ जाएगी?

जवाब- ये तो है, सवाल होगा और ज्यादा पिटीशन होंगी तो और ज्यादा सवाल उठेंगे। उसी ज्यूडीशरी के पास जाएंगे जिन्होंने इसमें शामिल होकर अपील सुनी है तो और ज्यादा बेहतर तरीके से जिम्मेदारी तय हो पाएगी।

सवाल- चुनाव आयोग का गोल्ड रिजीम खत्म होता दिख रहा है क्या?

जवाब- अभी यह कहना जल्दबाजी होगा। हमारी कानून व्यवस्था दोष सिद्ध होने तक दोषी नहीं मानती है। ऐसे में हमें भी इस प्रक्रिया के पूरे परिणामों का इंतजार करना चाहिए। आगे पता चलेगा कि सही हुआ या नहीं हुआ है।

सवाल- हारने वाला चुनाव आयोग को अपनी हार के लिए जिम्मेदार ठहराता है, क्या हमारे यहां पर परिणामों से छेड़छाड़ संभव है?

जवाब- पहले मैं स्पष्ट करूंगा कि ईवीएम फुल प्रूफ है, इसमें कोई भी छेड़छाड़ संभव नहीं है। पूरी प्रक्रिया राजनीतिक दलों के साथ ही होती है। हर प्रक्रिया में सभी दल के पोलिंग एजेंट शामिल होते हैं। उनकी हर जगह पर सहमति ली जाती है। हारने वाला कभी भी हार का ठीकरा खुद पर या अपने कार्यकर्ताओं पर नहीं डालता, वह उनका मनोबल नहीं गिराना चाहता है।

ऐसे में खामोश रहने वाली ईवीएम को आरोपी बना दिया जाता है, क्योंकि वह तो जवाब देगी नहीं। इलेक्शन कमीशन ने दो बार सभी दलों को ईवीएम में छेड़छाड़ के लाइव सबूत देने की चुनौती दी थी, लेकिन आज तक किसी ने कुछ नहीं किया, मैंने भी पांच दिन तक इंतजार किया था लेकिन कोई आया ही नहीं। खुद भाजपा ने 2009 में जीव्हीएल नरसिम्हा राव से किताब लिखवाई थी, लेकिन वो भी नहीं आई थी।

सवाल- चुनाव सुधारों के लिए किस तरह से आगे बढ़ना चाहिए?

जवाब- चुनाव सुधार एक सतत प्रक्रिया है। लेकिन सबसे ज्यादा जरूरी है कि इलेक्शन कैंपेन फाइनेंस करने की। हमें स्टेट फंडिंग की ओर बढ़ना चाहिए। अगर कॉरपोरेट फंडिग आएगी तो उनके इंट्रेस्ट भी आएंगे। चुनाव आयोग ने कैंडीडेट स्तर पर खर्च की सीलिंग जरूर बेहतर कर ली है, अब इसको पार्टी स्तर पर भी करने की जरूरत है।

यही बड़ा लूप-होल है, जहां पर चुनाव महंगा हो रहा है। पार्टियों के नाम पर अंधाधुंध पैसा खर्च हो रहा है और आयोग कुछ नहीं कर पा रहा है। हमने एक विधानसभा के एक छोटे से क्षेत्र में 90 करोड़ रुपए बंटने का सबूत पकड़ लिया था, सब कुछ पार्टी के नाम पर हो रहा था। ऐसी चीजें इसीलिए हो रही हैं कि पार्टी कितना भी खर्च कर सकती है। इस पर सीलिंग लगनी चाहिए।

सवाल- चुनावी घोषणापत्र में फ्री-बीज जिस तरह से बढ़ा है, क्या यह मतदाताओं को प्रलोभन नहीं है?

जवाब- सहमत हूं। चुनाव से छह महीने पहले से रोक लगनी चाहिए। सरकारें छह महीने पहले से चुनावी योजनाएं बंद करें, पहले राजनीतिक दल ऐसा करते भी थे। लेकिन अब इसके उलट हो रहा है, इस तरह की योजनाओं की घोषणा हो रही है। हमने बिहार के चुनावों में देखा है, चुनाव तक ऐसी योजनाओं के जरिए पैसा बांटा जा रहा था। इसको तेजी के साथ रोका जाना चाहिए।

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