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जन्मदिन विशेष: ‘ऑपरेशन ब्लैक थंडर’ से ‘डोभाल डॉक्ट्रिन’ तक…जानिए कैसे एक शख्स ने बदल दी भारत की रक्षा नीति
- Written By: अभिषेक सिंह
Ajit Doval Birthday: अजीत डोभाल आज 81वां जन्मदिन मना रहे हैं। इस मौके पर जानते हैं उस शख्स की कहानी, जिसने कभी रिक्शावाला बनकर आतंकियों की कमर तोड़ी, तो कभी फकीर बनकर पाकिस्तान की सड़कों पर जासूसी की।

कीर्ति चक्र सम्मानित किए जाते हुए अजीत डोभाल (सोर्स- सोशल मीडिया)
Ajit Doval Birthday Special: भारतीय रक्षा और कूटनीति के गलियारों में एक कहावत मशहूर है कि ‘जब अजीत डोभाल खामोश होते हैं, तो समझ लीजिए कि दुश्मन के खेमे में शोर मचने वाला है।’ यह कहावत एकाएक नहीं जन्मी इसके पीछे कई ऐसे ऑपरेशन हैं जिन्हें अजित डोभाल ने बखूबी अंजाम दिया है। कई मौकों पर उन्होंने खामोश रहते हुए दुश्मन को दहलाया भी है।
आज यानी मंगलवार 20 जनवरी 2026 को भारतीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल अपना 81वां जन्मदिन मना रहे हैं। इस मौके पर आइए जानते हैं उस शख्स की कहानी, जिसने कभी रिक्शावाला बनकर आतंकियों की कमर तोड़ी, तो कभी फकीर बनकर पाकिस्तान की सड़कों पर जासूसी की।
आखिर क्यों मशहूर हैं अजीत डोभाल?
20 जनवरी साल 1945 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल में जन्मे अजीत कुमार डोभाल भारत के ऐसे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) हैं, जिन्होंने भारत की रक्षा नीति को ‘डिफेंसिव’ से बदलकर ‘आक्रामक रक्षा’ नीति में तब्दील कर दिया है। यही वजह है कि हर एक बड़े ऑपरेशन के पहले और बाद उनका नाम गूंजता है।
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डोभाल को क्यों कहते हैं जेम्स बॉन्ड?
अजीत डोभाल 1968 बैच के केरल कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं, लेकिन उनकी पहचान वर्दी से ज्यादा उनके ‘अंडरकवर’ ऑपरेशन्स से बनी। उन्हें भारत का ‘जेम्स बॉन्ड’ यूं ही नहीं कहा जाता। इसके पीछे 7 साल का वह समय है जो उन्होंने पाकिस्तान में एक मुस्लिम बनकर बिताया।
…जब पाकिस्तान में खुल गई थी पोल
उन्होंने खुद बताया है कि पाकिस्तान में जासूसी के दौरान एक बार उनकी पहचान लगभग उजागर हो गई थी। एक मजार के पास एक लंबी दाढ़ी वाले व्यक्ति ने उन्हें पहचान लिया था कि उनके कान छिदे हुए हैं। तब भी वह घबराए नहीं बल्कि उस शख्स के सवालों का जवाब देते रहे। अंत में उस शख्स ने खुद बताया कि वह हिंदू है और उसने डर के मारे इस्लाम अपना रखा है।
रिक्शावाला बनकर चलाया ‘ब्लैक थंडर’
1988 का स्वर्ण मंदिर ऑपरेशन उनके करियर का सबसे साहसिक अध्याय है। जब खालिस्तानी आतंकियों ने स्वर्ण मंदिर पर कब्जा कर लिया था, तब डोभाल एक रिक्शावाला बनकर मंदिर के अंदर दाखिल हुए थे। उन्होंने आतंकियों को यकीन दिलाया कि वे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के जासूस हैं और उनकी मदद के लिए आए हैं।
‘कीर्ति चक्र’ से किया गया सम्मानित
आतंकी उनके झांसे में आ गए और अपनी सारी रणनीतियां, संख्या और हथियारों की जानकारी डोभाल को दे दी। इसी जानकारी के आधार पर ‘ऑपरेशन ब्लैक थंडर’ सफल हुआ और बिना ज्यादा खून-खराबे के मंदिर को मुक्त कराया गया। इस अदम्य साहस के लिए उन्हें ‘कीर्ति चक्र’ से सम्मानित किया गया। यह सम्मान पाने वाले वे पहले पुलिस अधिकारी बने।
अजीत डोभाल (सोर्स- सोशल मीडिया)
डोभाल की खासियत सिर्फ जासूसी नहीं, बल्कि उनकी बातचीत की कला भी है। मिजोरम में उग्रवाद के दौरान, उन्होंने मिजो नेशनल फ्रंट के नेता लालडेंगा के 7 में से 6 कमांडरों को अपनी तरफ मिला लिया था, जिससे वहां शांति स्थापना संभव हो सकी। इसी तरह, 1999 के कंधार विमान अपहरण कांड (IC-814) में भी वे भारत के मेन नेगोशिएटर बनकर पहुंचे थे।
‘डोभाल डॉक्ट्रिन’ और मोदी युग का मेल
2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने अजीत डोभाल को अपना राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार चुना। इसके बाद भारत की सुरक्षा नीति में एक बड़ा बदलाव आया, जिसे दुनिया ‘डोभाल डॉक्ट्रिन’ के नाम से जानती है। यह डोभाल का वह सिद्धांत है जिसमें कहा जाता है कि हम अपनी जमीन पर लड़ाई नहीं लड़ेंगे, बल्कि खतरे को उसके सोर्स पर ही खत्म करेंगे।
दुनिया ने देखी डोभाल की रणनीति
‘डोभाल डॉक्ट्रिन’ का हालिया उदाहरण बीते साल मई में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान दुनिया ने देखा। इससे पहले 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक और 2019 की बालाकोट एयर स्ट्राइक में देखने को मिला। तब उरी और पुलवामा हमलों के बाद, डोभाल की निगरानी में भारत ने पाकिस्तान के घर में घुसकर आतंकियों का सफाया किया था।
यह भी पढ़ें: जयंती विशेष: कौन थे हरचंद सिंह लोंगोवाल? राजीव गांधी के साथ किया ऐसा समझौता…जो बन गया मौत की वजह
यह भारत के इतिहास में पहली बार था जब उसने आतंकवाद के खिलाफ इतना आक्रामक रुख अपनाया। इसके अलावा, धारा 370 को हटाने के दौरान कश्मीर में शांति बनाए रखने के लिए डोभाल का वहां खुद मौजूद रहना और स्थानीय लोगों के साथ बिरयानी खाने वाली तस्वीरें उनकी जमीनी पकड़ की कहानी बयां करती हैं।
वैश्विक कूटनीति के बेहतरीन ‘चाणक्य’
आज अजीत डोभाल की भूमिका केवल सीमाओं तक सीमित नहीं है। रूस-यूक्रेन युद्ध हो या अमेरिका के साथ भारत के रिश्ते, डोभाल एक ‘शैडो डिप्लोमैट’ की भूमिका निभाते हैं। पुतिन से उनकी सीधी मुलाकातें और अमेरिकी एनएसए जेक सुलिवन के साथ उनकी केमिस्ट्री यह बताती है कि वैश्विक पटल पर भारत का कद बढ़ाने में उनकी कितनी अहम भूमिका है।
Frequently Asked Questions
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Que: अजीत डोभाल को भारत का ‘जेम्स बॉन्ड’ क्यों कहा जाता है?
Ans: अजीत डोभाल को ‘जेम्स बॉन्ड’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने कई बेहद खतरनाक अंडरकवर ऑपरेशनों को अंजाम दिया। पाकिस्तान में मुस्लिम बनकर सात साल तक जासूसी करना, स्वर्ण मंदिर ऑपरेशन के दौरान रिक्शावाला बनकर आतंकियों के बीच पहुंचना और उनकी रणनीतियों की जानकारी हासिल करना, उनकी इसी साहसिक छवि को दर्शाता है।
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Que: ‘डोभाल डॉक्ट्रिन’ क्या है और इसका भारत की सुरक्षा नीति पर क्या असर पड़ा?
Ans: ‘डोभाल डॉक्ट्रिन’ का मतलब है कि भारत अपनी जमीन पर आतंकवाद से लड़ने के बजाय खतरे के स्रोत पर ही उसे खत्म करेगा। इस नीति के तहत 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक, 2019 की बालाकोट एयर स्ट्राइक और बाद के कई ऑपरेशन किए गए, जिससे भारत की रक्षा नीति रक्षात्मक से आक्रामक हो गई।
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Que: अजीत डोभाल की भूमिका केवल सुरक्षा तक सीमित क्यों नहीं मानी जाती?
Ans: अजीत डोभाल को एक कुशल सुरक्षा रणनीतिकार के साथ-साथ ‘शैडो डिप्लोमैट’ भी माना जाता है। रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे वैश्विक संकटों में उनकी भूमिका, अमेरिका और रूस जैसे देशों के शीर्ष नेताओं से सीधा संवाद और भारत की कूटनीतिक स्थिति को मजबूत करना, उनकी व्यापक रणनीतिक समझ को दर्शाता है।
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