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वो नेता जो क्रिकेट में बनाना चाहता था अपनी पहचान, पिता की एक सलाह पर बदला करियर, बन गए राजनीति के सुल्तान
- Written By: अक्षय साहू
Asaduddin Owaisi Biography: असदुद्दीन ओवैसी के जन्मदिन पर जानिए उनके क्रिकेटर से बैरिस्टर और फिर दिग्गज राजनेता बनने का अनसुना सफर, जहां उन्होंने राजनीति के लिए वकालत और क्रिकेट का जुनून छोड़ दिया।

राजनेता नहीं क्रिकेटर बनना चाहते थे असदुद्दीन ओवैसी (फाइल फोटो, सोर्स- सोशल मीडिया)
Asaduddin Owaisi Birthday: भारतीय राजनीति में कुछ ही ऐसे चेहरे हैं जो सिर्फ अपने भाषणों या बयानों के कारण नहीं, बल्कि अपनी अलग राजनीतिक पहचान और विचारधारा की वजह से चर्चा में रहते हैं। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन यानी AIMIM के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी उन्हीं नेताओं में से एक हैं। ओवैसी को राजनीति विरासत में मिली थी।
दिलचस्प बात ये है कि ओवैसी कभी राजनीति में आना ही नहीं चाहते थे। उनका पहला प्यार कभी राजनीति थी ही नहीं बल्कि वो तो तेज गेंजबाज बनना चाहते थे। लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ कि उन्होंने क्रिकेट की जर्सी छोड़कर पहले वकालत की काला कोट पहना और पिता के कहने पर राजनीति में आ गए। जिसकी कीमत उन्होंने एक बार नहीं कई बार चुकानी भी पड़ी। कभी सैकड़ों लोगों की भीड़ के बीच उन्हें पीटा गया तो कभी पुलिस उन्हें बस मारने ही वाली थी। आएइ आपको असदुद्दीन ओवैसी के 57वें जन्मदिन के मौक पर उनकी जिंदगी और राजनीतिक सफर से जुड़े कुछ अनसुने किस्सों के बारे में बताते हैं…
क्रिकेट के लिए क्लास बंक करते थे ओवैसी
असदुद्दीन ओवैसी का जन्म 13 मई 1969 को हैदराबाद में हुआ। उनके पिता सुल्तान सलाउद्दीन ओवैसी हैदराबाद की राजनीति का बड़ा चेहरा थे और AIMIM के प्रभावशाली नेता माने जाते थे। परिवार राजनीतिक था, लेकिन बचपन में असदुद्दीन की दिलचस्पी राजनीति से ज्यादा क्रिकेट में थी। ओवैसी हैदराबाद के निजाम कॉलेज में पढ़ाई के दौरान तेज गेंदबाजी करते थे।
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क्रिकेट के दीवाने थे असदुद्दीन ओवैसी (सोर्स- सोशल मीडिया)
कहा जाता है कि, उनकी गेंदबाजी इतनी अच्छी थी लोकल लीग में उनका नाम आगे चलकर भारतीय टीम का हिस्सा बने तेज गेंदबाज वेंकटेश प्रसाद के साथ लिया जाता था। ओवैसी के लिए क्रिकेट सिर्फ शौक नहीं था, बल्कि जुनून था। वो अपने कई इंटरव्यू में बता चुके हैं कि वो कई बार क्रिकेट खेलने के लिए क्लास तक बंक कर देते थे।
पॉकेट मनी के लिए सफाई कर्मचारी का काम
हालांकि, उनके पिता चाहते थे कि वे पढ़ाई पर ध्यान दें और कानून की पढ़ाई करें। पिता की सलाह मानते हुए ओवैसी 1989 में लंदन चले गए। वहां उन्होंने कानून की पढ़ाई शुरू की। विदेश में पढ़ाई के दौरान उन्होंने जिंदगी के संघर्षों को भी करीब से देखा।
हैदराबाद से लोकसभा सांसद हैं ओवैसी (फाइल फोटो, सोर्स- सोशल मीडिया)
सुल्तान सलाउद्दीन ओवैसी सांसद थे लेकिन इसके बाद भी वो लंदन में पढ़ रहे असदुद्दीन के लिए सीमित पैसे भेजते थे। ऐसे में असदुद्दीन ओवैसी ने पॉकेट मनी और खर्च निकालने के लिए उन्होंने मैकडॉनल्ड्स में सफाई कर्मचारी और स्टोर हेल्पर जैसी पार्ट-टाइम नौकरियां भी कीं। यही अनुभव आगे चलकर उनकी सोच और व्यक्तित्व को और भी मजबूत बनाता गया। 1994 में उन्होंने कानून की पढ़ाई पूरी की और बैरिस्टर बनकर भारत लौट आए।
राजनीति नहीं वकालत करना चाहते थे ओवैसी
भारत लौटने के बाद भी उनकी पहली पसंद राजनीति नहीं थी। वे वकालत करना चाहते थे, लेकिन पिता के कहने पर उन्होंने राजनीति में कदम रखा। दिलचस्प बात ये है कि ये वही पिता थे जिन्होंने कभी चुनावी रैली में भाषण देने पर कड़ी फटकार लगाई थी। बात 1979 की है तब असदुद्दीन ओवैसी सिर्फ दस साल के थे और उस समय आंध्र प्रदेश में चुनाव हो रहे थे और AIMIM ये चुनाव लड़ रही थी। नन्हे असदुद्दीन AIMIM की एक चुनावी रैली में शामिल हुए और माइक पर भाषण देने लगे। लेकिन जब ये बात उनके पिता सुल्तान सलाउद्दीन ओवैसी को पता चली तो वो बहुत नाराज हुए और उन्हें असदुद्दीन ओवैसी को डांटते हुए कहा था कि उनकी उम्र राजनीति करने की नहीं है, अभी वो केवल अपनी पढ़ाई पर ध्यान दें।
पिता की सलाह पर राजनीति में आए थे असदुद्दीन ओवैसी (फाइल फोटो, सोर्स- सोशल मीडिया)
लेकिन अब वक्त बदल गया था, उन्हीं पिता ने उन्हें राजनीति में आने की सलाह दी थी। 1994 में असदुद्दीन ओवैसी ने हैदराबाद की चारमीनार विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा। पहली बार चुनाव मैदान में उतरे ओवैसी ने जीत हासिल की और यहीं से उनके राजनीतिक सफर की शुरुआत हुई। राजनीति में आने के बाद उन्होंने खुद को सिर्फ एक नेता के रूप में नहीं, बल्कि एक गंभीर वक्ता और संवैधानिक समझ रखने वाले व्यक्ति के तौर पर स्थापित किया।
शादी के अगले दिन विधानसभा पहुंच गए ओवैसी
ओवैसी राजनीति को लेकर कितने गंभीर हैं उसका पता इस बात से पता चलता है कि 1996 में वो अपनी शादी की अगली सुबह ही विधानसभा में सरकार के खिलाफ एक अहम मुद्दे पर बोलने के लिए विधानसभा पहुंच गए थे। दरअसल, नवंबर 1996 में चारमीनार इलाके में एक हिंसा के दौरान एक मुस्लिम युवक की मौत हो गई थी। राज्य में तब बीजेपी समर्थित चंद्रबाबू नायडू की सरकार थी। ओवैसी ने सरकार के सामने मांग रखी कि इस मुद्दे पर विधानसभा में बहस रखी जाए। सरकार ने उनकी बात मान ली और 12 दिसंबर 1996 की तारीख उन्हें दे दी।
असदुद्दीन ओवैसी (फाइल फोटो- सोशल मीडिया)
कहा जाता है कि, सरकार ने ये तारीख बहुत सोच समझकर रखी थी। क्योंकि 11 दिसंबर 1996 को असदुद्दीन ओवैसी की शादी थी। सरकार को लगा कि वो अपनी शादी के अगले ही दिन विधानसभा नहीं आ पाएगें। लेकिन लोग ये देखकर हैरान रह गए कि 12 दिसंबर को ओवैसी सुबह सात बजे ही विधानसभा पहुंच गए थे वो भी पूरी तैयारी के साथ। जिसके बाद उन्हें विधान सभा में जोरदार भाषण दिया था और सरकार को घेरा था।
जब भीड़ के सामने पुलिस ने ओवैसी को बुरी तरह पीटा
ओवैसी अक्सर मुस्लामनों के मुद्दों को लेकर सरकार के खिलाफ खड़े होते थे, जिसके चलते कई बार उन्हें पुसिस की लाठीयां भी खानी पड़ती थी। ओवैसी बताते हैं कि 1999 में चारमीनार इलाके में गणेश उत्सव की रैली निकल रही थी। इस दौरान हिंसा भड़क गई, तब वो सांसद होने के नाते हिंसा को शांत कराने के लिए वहां पहुंचे थे। लेकिन सरकार द्वारा गठीत SIT ने उन पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाते हुए उन्हें इतना पीटा था कि उनके सिर में 20 टांके लगे थे और उन्हें “पीठ से पैर तक” मारा गया। ओवैसी दावा करते हैं कि, SIT इस दौरान गोली मारने का प्लान भी बना चुकी थी।
2004 में पिता के बाद संभाली पार्टी
2004 में उनके पिता सक्रिय राजनीति से पीछे हटे, जिसके बाद असदुद्दीन ओवैसी पहली बार हैदराबाद लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। संसद में उनके भाषण अक्सर चर्चा का विषय बने। वे अपने भाषणों में कानूनी और संवैधानिक तर्कों का इस्तेमाल करते हैं, जिसकी वजह से समर्थक उन्हें एक मजबूत और पढ़ा-लिखा नेता मानते हैं।
ओवैसी के नेतृत्व में AIMIM ने हैदराबाद से बाहर भी अपनी पहचान बनाने की शुरुआत की। महाराष्ट्र, बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में पार्टी ने चुनाव लड़े और कई जगहों पर सफलता भी हासिल की। उन्होंने दलित और मुस्लिम समुदायों को साथ लाने के लिए “जय भीम, जय मीम” का नारा दिया, जिसने राजनीतिक गलियारों में काफी चर्चा बटोरी।
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भाषणों के चलते विवादों में रहे ओवैसी
हालांकि, दूसरी तरफ ओवैसी कई बार अपने बयानों के चलते विवादों में भी रहे हैं। ‘भारत माता की जय’ और ‘वंदे मातरम’ जैसे नारों को लेकर दिए गए उनके बयानों पर काफी बहस हुई। ओवैसी का कहना था कि संविधान किसी नागरिक को कोई खास नारा बोलने के लिए मजबूर नहीं करता और इस्लाम में केवल एक ईश्वर की इबादत की जाती है। उनके इस रुख की कई लोगों ने आलोचना की, जबकि समर्थकों ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुद्दा बताया।
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