

Reducing Fuel Gold Consumption: बचत और मितव्ययता की सलाह तो महात्मा गांधी भी दिया करते थे, लेकिन क्या आजादी के 7 दशक बाद खुली अर्थव्यवस्था के युग में यह संभव है? क्या देशवासी प्रधानमंत्री मोदी का परामर्श मानकर मन मारकर जीने को तैयार होंगे? आज की पौड़ी उपभोग प्रधान मानसिकता रखती है। वह अपने पालकों की भी नहीं सुनती तो किसी अन्य की बात क्यों सुनेगी ? प्रधानमंत्री का तर्क है कि विदेशी मुद्रा (फॉरेक्स) बचाने के लिए उपभोग में कटौती की जाए जैसे कि लोग पेट्रोल-डीजल का इस्तेमाल घटाएं तथा स्वर्णाभूषण खरीदना टालें।
इससे डॉलर की मांग घटेगी। अब यदि सारे देशवासी विवाह सहित सभी समारोहों के लिए या त्योहारों पर अचानक सोना खरीदना बंद कर दें तथा कोविड काल के समान वर्क फ्रॉम होम लागू हो जाए तो विदेशी मुद्रा बचेगी, लेकिन दूसरी ओर उपभोग कमजोर होने से व्यवसाय, उद्योग प्रभावित होंगे।
सरकार के सारे प्रयासों के बाद भी अर्थव्यवस्था गति नहीं पकड़ेगी। यह कदम निवेश को हतोत्साहित करेगा। विदेश यात्रा तथा आयात रुका तो बंदरगाहों व एयरपोर्ट का संचालन खर्च कहां से आएगा? सरकार ने इन्हें आधुनिक व सुविधासंपन्न बनाने पर काफी व्यय किया है। इन बातों का आर्थिक विकास पर विपरीत असर पड़ेगा। विदेशी भी भारत में निवेश करना टालेंगे क्योंकि जहां मांग कम हुई, वहां कोई क्यों पैसा लगाएगा? इस स्थिति का समाधान यह है कि घरेलू उत्पादन बढ़ाया जाए। ईज ऑफ डूइंग बिजनेस (व्यापार करने में सुलभता) के तहत नया निवेश हासिल किया जाए जो घरेलू या विदेशी कुछ भी हो सकता है। उत्पादन बढ़ाकर ही भारत वैश्विक निर्यात बाजार में अपनी हिस्सेदारी का विस्तार कर सकता है। सीधी बात है कि निर्यात बढ़ेगा तो देश में काफी विदेशी मुद्रा आएगी।
पर्यटन को जोर-शोर से बढ़ावा देकर भी फॉरिन एक्सचेंज हासिल किया जा सकता है। विदेशी टूरिस्ट अपने साथ डॉलर लाएंगे और भारतीय रुपए में कन्वर्ट करेंगे। न्यूनतम 1,000 डॉलर देकर वह 95,000 रुपए हासिल कर सकते हैं और गोवा या राजस्थान के पर्यटन स्थलों की सैर कर सकते हैं। भारत खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर हुआ है तो विदेशी उर्वरक की वजह से।
देसी खाद (गोबर, वर्मी कंपोस्ट) से इतनी उपज नहीं हो सकती कि 140 करोड़ देशवासियों का पेट भर सके, यदि स्वदेश में रासायनिक खाद का निर्माण करना है तो उसके लिए भी प्राकृतिक गैस व नाफ्था का इस्तेमाल करना होगा जिसकी सप्लाई विदेश से होती है। इसी तरह आयात किए जा रहे क्रूड ऑयल का विकल्प भी जल्दबाजी में संभव नहीं है।
ई-वाहनों को बढ़ावा देने का तर्क है लेकिन उनके लिए चिप्स भी तो विदेश से आएगी। यूरिया पर ज्यादा सब्सिडी देने से उसका असंतुलित इस्तेमाल हुआ है। इसलिए रासायनिक खाद का इस्तेमाल कर प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जा सकता है। इस तथ्य को स्वीकार करना होगा कि 1991 में आर्थिक सुधार लागू किए जाने के बाद से भारत निर्यात की तुलना में आयात अधिक करता है। रुपए के कमजोर होने से आयात महंगा हुआ है।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा