
तेजस्विनी कोल्हापुरे (फोटो-सोर्स,सोशल मीडिया)
Tejaswini Kolhapure Share OTT Experience: अभिनेत्री तेजस्विनी कोल्हापुरे का नाम उन कलाकारों में शुमार है जिन्होंने कभी भी आसान रास्ता नहीं चुना। पद्मिनी कोल्हापुरे की बहन और श्रद्धा कपूर की मौसी होने के बावजूद, तेजस्विनी ने अपने करियर में ग्लैमर से ज्यादा कंटेंट और परफॉर्मेंस को प्राथमिकता दी। उन्होंने टीवी शो ‘मुझे चांद चाहिए’ से अपने अभिनय सफर की शुरुआत की और अनुराग कश्यप की चर्चित फिल्म ‘पांच’ (2003) से बॉलीवुड में कदम रखा।
दरअसल, तेजस्विनी थिएटर और प्रयोगवादी सिनेमा से गहराई से जुड़ी रही हैं। खास तौर पर फिल्म ‘अग्ली’ (2013) में उनका किरदार ‘शालिनी’ आज भी दर्शकों को झकझोर देता है। इसी बीच हाल ही में उन्होंने नवराष्ट्र की एडिटर दिपाली नाफडे से अपने करियर, मानसिक चुनौतियों और इंडस्ट्री के बदलते दौर पर बेबाकी से बात की। तो पेश है एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू…

जब इंटरव्यू के दौरान तेजस्विनी से पूछा गया कि ‘अग्ली’ में डिप्रेशन और असहायता से जूझ रही शालिनी के किरदार को निभाना कितना मुश्किल था, तो उन्होंने बताया कि यह रोल सिर्फ एक्टिंग नहीं, बल्कि एक गहरी मानसिक यात्रा थी।
उनके मुताबिक, अनुराग कश्यप बनावटी अभिनय बिल्कुल नहीं चाहते थे। हर भावना को भीतर से महसूस करना जरूरी था। उन्होंने अपने निजी अनुभवों और भावनाओं को किरदार में शामिल किया, ताकि पर्दे पर दर्द नकली न लगे।
तेजस्विनी मानती हैं कि उस मानसिक अवस्था में जाना जितना कठिन था, उससे बाहर आना भी उतना ही चुनौतीपूर्ण रहा। लेकिन एक कलाकार के रूप में यह अनुभव उन्हें बहुत कुछ सिखा गया।
ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के बढ़ते प्रभाव पर बात करते हुए तेजस्विनी ने कहा कि आज का दौर कंटेंट-ड्रिवन हो गया है, जो इंडस्ट्री के लिए सकारात्मक बदलाव है। उनका मानना है कि अब सिर्फ बड़े नाम या स्टारडम ही नहीं, बल्कि सच्चा अभिनय भी मायने रखता है। ऐसे कलाकारों के लिए नए मौके बन रहे हैं जो परफॉर्मेंस को प्राथमिकता देते हैं। उम्र, इमेज या ग्लैमर से ज़्यादा अब किरदार की सच्चाई को महत्व मिल रहा है।

तेजस्विनी के करियर में कई लंबे अंतराल आए, लेकिन उन्होंने इन्हें कभी नकारात्मक रूप में नहीं देखा। एक पुराने इंटरव्यू में कही गई उनकी बात “मैं इंतजार करना जानती हूं”, आज भी उनके सफर को परिभाषित करती है। इन ब्रेक्स के दौरान उन्होंने थिएटर किया, किताबें पढ़ीं और खुद को मानसिक रूप से मजबूत बनाया। उन्होंने स्वीकार किया कि डर जरूर लगा, लेकिन उन्होंने उस डर को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। उनका भरोसा हमेशा सही काम और सही समय पर बना रहा।
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आपको बता दें, लता मंगेशकर जैसे सांस्कृतिक विरासत वाले परिवार से आने के बावजूद तेजस्विनी ने कभी ‘कमर्शियल हीरोइन’ बनने की दौड़ नहीं लगाई। उन्होंने साफ कहा कि ‘अग्ली’ जैसी डार्क और रियलिस्टिक फिल्मों को चुनना उनका सोच-समझकर लिया गया फैसला था। उनके लिए सबसे अहम था किरदार की सच्चाई और काम की ईमानदारी। फिलहाल, तेजस्विनी कोल्हापुरे आज भी उन कलाकारों में गिनी जाती हैं जो कम दिखाई देती हैं, लेकिन जब आती हैं तो गहरी छाप छोड़ जाती हैं।






