
गुलाम नबी आज़ाद (डिजाइन फोटो)
श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर में चुनाव का शंखनाद हो चुका है। कई पार्टियां वोटर्स को लुभाने के लिए अपने-अपने एजेंडे तय कर चुकी हैं। जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने अपने-अपने घोषणा पत्र भी जारी कर दिए हैं। वहीं, दूसरी तरफ पहली बार चुनावी मैदान में उतरने वाली पार्टी डीपीएपी के अध्यक्ष गुलाम नबी आज़ाद निष्क्रिय नज़र आ रहे हैं। जिसे लेकर सियासी फिजाओं में तरह-तरह के सवालों के गुबार उमड़ रहे हैं।
साल 2022 में कांग्रेस छोड़ने के बाद गुलाम नबी आजाद ने डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव आजाद पार्टी बनाई थी। आजाद ने उन नेताओं को अपनी पार्टी में जोड़ा जो कांग्रेस या अन्य पार्टियों से नाराज थे। शुरुआत में कहा गया कि आजाद की पार्टी घाटी की ज्यादातर सीटों पर फोकस कर रही है। आजाद ने कश्मीर में पूरी ताकत से चुनाव लड़ने का भी ऐलान किया था।
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1970 के आसपास राजनीति में आए गुलाम नबी आजाद जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। इसके अलावा आजाद कई केंद्र सरकारों में मंत्री रह चुके हैं। आजाद 2014 से 2021 तक राज्यसभा में विपक्ष के नेता रह चुके हैं। आजाद की गिनती कांग्रेस के अंदर बड़े नेताओं में होती थी।
पार्टी बनाने के बाद पहले लोकसभा और फिर विधानसभा नहीं लड़ा मार्च 2024 में जब लोकसभा चुनाव की घोषणा हुई तो डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव आजाद पार्टी ने गुलाम नबी को बारामूला सीट से अपना उम्मीदवार घोषित किया, लेकिन नाम घोषित होने के कुछ दिन बाद ही आजाद ने चुनाव न लड़ने का ऐलान कर दिया। इसके बाद चुनाव में आजाद की पार्टी की ओर से 3 जगहों पर उम्मीदवार उतारे गए। चुनाव आयोग के मुताबिक, तीनों सीटों पर डीपीएपी उम्मीदवारों को सिर्फ 80,264 वोट मिले।
तीनों सीटों पर आजाद की पार्टी के नेताओं की जमानत जब्त हो गई। इसके बाद गुलाम के विधानसभा चुनाव लड़ने के कयास लगने लगे। कहा जा रहा था कि वह अपनी पुरानी भद्रवाह सीट से चुनाव लड़ सकते हैं, लेकिन विधानसभा चुनाव की घोषणा होते ही आजाद ने ऐलान कर दिया कि वह चुनाव नहीं लड़ेंगे। वहीं, अब उन्होंने सेहत का हवाला देते हुए प्रचार न करने का ऐलान किया है। उन्होंने उम्मीदवारों से अपील की है कि वह चाहें तो पर्चा चुनावी मैदान से पीछे हट सकते हैं।
डीपीएपी और आजाद के इस रवैये को लेकर सियासी पंडितों का कहना है कि उन्हें उम्मीद के मुताबिक बड़ी पार्टियों से भाव नहीं मिला। न ही विपक्षी दलों की तरफ से किसी ने गठबंधन की पेशकश की न ही बीजेपी ने ऐसे में उन्होंने बैकफुट पर खेलना ही बेहतर समझा है। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर में 370 एक अहम मुद्दा है। उसके विरोध या समर्थन यहां चुनावी एजेंडा रहने वाला है, लेकिन गुलाम नबी आजाद का रुख इस पर भी आजाद रहा है। इसके अलावा कई बड़े नेता गुलाम नबी आजाद की पार्टी छोड़ चुके हैं यह भी एक बड़ा रीजन हो सकता है।
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इन सबके बीच चर्चा चल रही है कि अगर ऐसा ही रहा तो डीपीएपी का वजूद ख़त्म हो जाएगा। राजनीतिक गलियारों में हवा तो यह भी है कि इन सब कारणों से गुलाम नबी आजाद के भी राजनीतिक भविष्य पर ख़तरा मंडरा रहा है। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले वक्त में गुलाम नबी आजाद कौन सा रुख अपनाते हैं।






