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माओवाद और नक्सलवाद गिन रहा है अंतिम सांसें : माओवादी नेताओं के आत्मसमर्पण से संगठन खात्मे की ओर
- Written By: विजय कुमार तिवारी
सरकार की आक्रामक रणनीति और विकास कार्यों की निरंतरता से नक्सलवाद की चुनौती जल्द ही समाप्त हो जाएगी तो आत्मसमर्पण कर चुके माओवादियों का उचित पुनर्वास और विकास कार्यों को जारी रखना जरुरी होगा।

प्रतीकात्मक तस्वीर- माओवादी(फोटो- सोशल मीडिया)
भारत में दशकों से आंतरिक सुरक्षा के लिए चुनौती रहा माओवाद (नक्सलवाद) अब अपने अंतिम चरण में है। सरकार की रणनीति में तेजी से आए बदलाव और सुरक्षा बलों के निर्णायक अभियानों के सुखद परिणाम सामने आए हैं। हाल के वर्षों में माओवाद का शिकंजा स्पष्ट रूप से कमजोर हुआ है; वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों की संख्या में कमी आई है और हिंसा की घटनाओं में लगातार गिरावट दर्ज की गई है।
हाल ही में मिली कुछ बड़ी सफलताओं ने माओवादी संगठनों की कमर तोड़ दी है। इन बातों से आसानी से इसे समझा जा सकता है….
1. शीर्ष नेताओं का आत्मसमर्पण: महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में माओवादियों के केंद्रीय कमेटी एवं पोलित ब्यूरो के सदस्य दामोजी और उनकी पत्नी सोमजी का आत्मसमर्पण। जिससे शीर्ष नेतृत्व अब खत्म हो जाएगा।
2. बड़ा सामूहिक आत्मसमर्पण: झारखंड में जोनल कमांडर रह चुके 60 माओवादियों के आत्मसमर्पण के अलावा, छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में 17 अक्टूबर को 210 सदस्यों (जिनमें पूर्व डेकाबरगडू माओवादी महिला कॉमरेड उषा कंचन, भास्कर उर्फ शंकर, मधु, माहेंद, सचिन उर्फ सत्यम और पूर्व-बस्तर सचिव निर्मल शामिल हैं) ने ऐतिहासिक हथियारों के साथ पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण किया। इसे देश में अब तक का सबसे बड़ा आत्मसमर्पण बताया गया है। कहा जा रहा है कि माओवादी संगठनों को अब एक गंभीर नेतृत्व संकट का सामना करना पड़ रहा है। वर्ष 2025 के मई तक, 312 माओवादी मुठभेड़ में मारे गए हैं, और 1,600 से अधिक आत्मसमर्पण कर चुके हैं, जो संगठन के भीतर निराशा और हार को दर्शाता है।
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3. सुधारात्मक निर्णय: फरवरी 2024 में माओवादियों के केंद्रीय कमेटी ने पार्टी को बचाने के लिए ‘सुधारक तरीके’ अपनाने का निर्णय लिया था, लेकिन यह भी संगठन को टूटने से नहीं बचा सका। बड़े नेताओं से लेकर आम सदस्यों तक ने सुरक्षा बलों के सामने आत्मसमर्पण करने के लिए आतुरता दिखाई है।
4. शीर्ष नेतृत्व को झटका: इन सुधारों के बावजूद, मई 2025 में पार्टी महासचिव बसवराजू नारायणपुर जिले में पुलिस मुठभेड़ में मारा गया और पुलिस ने उसके शव को बरामद किया। इसे सुरक्षा बलों ने एक बड़ी सफलता के रूप में देखा है। इसके अलावा, माओवादियों के नए केंद्रीय कमेटी सदस्य किस्तैया की गिरफ्तारी ने सुरक्षा बलों को एक और बड़ी कामयाबी दिलाई है।
सांकेतिक तस्वीर (सोर्स- सोशल मीडिया)
आत्मसमर्पण योजना और भविष्य की राह
माओवाद के बचे हुए प्रभाव को खत्म करने के लिए, सरकार आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों के लिए पुनर्वास देने हेतु एक नई योजना पर काम कर रही है। आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों को समाज में सम्मान और शांतिपूर्ण जीवन का अवसर देने के लिए विशेष पुनर्वास योजनाएँ लागू की गई हैं:–
1. वित्तीय और रोजगार सहायता: इन योजनाओं में नकद प्रोत्साहन, वित्तीय सहायता, प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर प्रदान किए जा रहे हैं।
2. पुनर्वास के लाभ: आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों को मुख्यधारा में शामिल होने के लिए विशेष पुनर्वास योजनाएं लागू होंगी। उन्हें प्रशिक्षण, रोजगार के अवसर, घर और खेती के लिए जमीन भी दी जाएगी।
सरकार के लिए यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों को पुनर्वास नीति का लाभ शीघ्र मिले और उन्हें आवश्यक प्रशिक्षण देकर रोजगार के साधन उपलब्ध कराए जाएं।
आत्मसमर्पण के बाद का सुखद जीवन
आत्मसमर्पण के बाद के अनुभवों में एक सुखद पहलू यह भी है कि कई पूर्व माओवादी अब शांतिपूर्ण और सामान्य जीवन शुरू कर रहे हैं। इन लोगों को सामान्य जीवन जीने की चाह मुख्य धारा में खींच लायी है। कई आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों ने शादी कर ली है, बच्चे हैं और शांतिपूर्ण जीवन जी रहे हैं। साथ ही साथ वे अपने सामाजिक जुड़ाव बढ़ाने के लिए सहमत हो गए हैं। पूर्व में आत्मसमर्पण कर चुके नरेश जैसे कई माओवादी नेताओं ने अब शांतिपूर्ण जीवन को अपना लिया है और खेती-किसानी और सामाजिक कार्यों में लगे हैं। उन्होंने स्वीकार किया है कि उनका संगठन गलत रास्ते पर था।
वर्तमान चुनौतियां और आगे की रणनीति
माओवाद के अंतिम चरण में होने के बावजूद कुछ चुनौतियाँ अब भी मौजूद हैं, जिन पर सरकार को ध्यान देना होगा:
1. आदिवासी अधिकारों का मुद्दा: सोनू और रुपेश जैसे कुछ आत्मसमर्पण करने वाले माओवादी अभी भी अपने पूर्व जीवन से जुड़े हैं और उनका कहना है कि वह अभी भी आदिवासियों के अधिकारों के लिए संघर्ष करते रहेंगे। ऐसे माओवादियों को मुख्यधारा में पूरी तरह से शामिल करने में चुनौतियां आ सकती हैं।
2. बुनियादी सुविधाओं का अभाव: माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव सबसे बड़ी चुनौती है। सुरक्षा बलों ने गाँवों तक पहुँचने के लिए सड़कों का निर्माण और मोबाइल टावरों का विकास किया है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि माओवाद प्रभावित क्षेत्रों के लिए विशेष विकास योजनाएं लागू हों, जिनमें शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं भी उपलब्ध हों। यह निगरानी भी करनी होगी कि विकास कार्यों को क्रियान्वित करने में पर्यावरण को कम से कम नुकसान हो।
सरकार की आक्रामक रणनीति और विकास कार्यों की निरंतरता से यह चुनौती जल्द ही समाप्त हो जाएगी। लेकिन आत्मसमर्पण कर चुके माओवादियों का उचित पुनर्वास और विकास कार्यों को जारी रखना सरकार के लिए सबसे महत्वपूर्ण कार्य है।
–एस. हनुमंत राव की कलम से
Maoism endgame india security forces strategy 2025
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