बिहार में नए मुख्यमंत्री का नाम लगभग तय, वो 5 कारण; जिसने सम्राट चौधरी को बनाया सबसे मजबूत दावेदार

Samrat Chaudhary: नीतीश कुमार और लालू यादव के बाद बिहार की राजनीति में नेतृत्व का एक बड़ा वैक्यूम बन रहा था। तेजस्वी के सामने भाजपा को एक ऐसे युवा और ऊर्जावान नेता की जरूरत थी, जो सीधे टक्कर दे सके।
samrat choudhary as the new chief minister of bihar
सम्राट चौधरी, (सोर्स- सोशल मीडिया)
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Samrat Chaudhary Next CM of Bihar: बिहार में पिछले कुछ महीने से जारी सियासी उठापटक अब थमने के करीब आ गया है। आज मंगलवार, 14 अप्रैल को नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद बीजेपी विधायक दल की हुई बैठक में सम्राट चौधरी को नेता के रूप में चुन लिया गया है। अब तक यह साफ हो गया है कि सम्राट चौधरी राज्य के अगले मुख्यमंत्री बन जाएंगे। औपचारिकता के रूप में एनडीए दल के विधयाकों का मुहर लगना है। गौरतलब है कि नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद बिहार में नए सीएम की तलाश शुरू हो गई थी, वो आखिरकार सम्राट चौधरी पर आकर पूरी हुई।

नीतीश कुमार के इस्तीफे से पहले बिहार के मुख्यमंत्री के रेस में केंद्रीय राज्य मंत्री नित्यानंद राय, श्रेयसी सिंह, विजय सिन्हा जैसे कई नाम की चर्चा थी। हालांकि, आखिरकार पार्टी के विधायकों ने सम्राट चौधरी को अपना नेता चुन लिया है। इस बीच यह सवाल उठता है कि आखिर सम्राट चौधरी के नाम पर ही क्यों सहमति बनीं। आइए सबकुछ विस्तार से समझते हैं।

1. पिछड़ा वर्ग और लव-कुश समीकरण में सेंधमारी

सम्राट चौधरी कुशवाहा समाज से आते हैं, जिसे बिहार की राजनीति में 'कुश' (कोइरी) वोट बैंक कहा जाता है। नीतीश कुमार का आधार 'लव-कुश' (कुर्मी-कोइरी) समीकरण रहा है। भाजपा ने सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाकर सीधे तौर पर नीतीश कुमार के इस अभेद्य दुर्ग में सेंधमारी की है। ओबीसी राजनीति के इस दौर में सम्राट चौधरी भाजपा के लिए सबसे बड़ा 'नॉन-यादव' पिछड़ा चेहरा बनकर उभरे हैं।

2. आक्रामक नेतृत्व और 'फायरब्रांड' छवि

सम्राट चौधरी अपनी बेबाक और आक्रामक राजनीति के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने पिछले दो वर्षों में नीतीश कुमार और आरजेडी के खिलाफ जिस तरह का मोर्चा संभाला, उसने भाजपा आलाकमान को प्रभावित किया। उनकी 'पगड़ी' वाली कसम (नीतीश को सत्ता से हटाने तक पगड़ी न खोलने का संकल्प) ने कार्यकर्ताओं में जोश भरने का काम किया। भाजपा अब बिहार में रक्षात्मक नहीं, बल्कि आक्रामक राजनीति करना चाहती है, जिसके लिए सम्राट फिट बैठते हैं।

3. सांगठनिक क्षमता और कार्यकर्ताओं में पैठ

प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर सम्राट चौधरी ने बिहार के कोने-कोने में संगठन को मजबूत किया है। उनके नेतृत्व में भाजपा ने जमीन पर अपनी पकड़ बढ़ाई और कार्यकर्ताओं को एकजुट किया। आलाकमान का मानना है कि सम्राट चौधरी न केवल सरकार चला सकते हैं, बल्कि 2029 के विधानसभा चुनाव और आगामी चुनावों में पार्टी को अपने दम पर बहुमत दिलाने की क्षमता रखते हैं।

4. युवा ऊर्जा और भविष्य की राजनीति

नीतीश कुमार और लालू यादव के बाद बिहार की राजनीति में नेतृत्व का एक बड़ा वैक्यूम बन रहा था। तेजस्वी यादव के सामने भाजपा को एक ऐसे युवा और ऊर्जावान नेता की जरूरत थी, जो सीधे टक्कर दे सके। सम्राट चौधरी उस युवा वर्ग को आकर्षित करने की क्षमता रखते हैं जो अब पुराने चेहरों से ऊब चुका है और बिहार में नया नेतृत्व चाहता है।

5. जाति जनगणना और मंडल राजनीति का जवाब

बिहार में जातिगत जनगणना की रिपोर्ट आने के बाद राजनीति पूरी तरह से मंडल 2.0 की ओर मुड़ गई है। आरजेडी और कांग्रेस लगातार 'जिसकी जितनी संख्या भारी' का नारा दे रहे हैं। ऐसे में भाजपा ने एक पिछड़े समाज के नेता को मुख्यमंत्री बनाकर विपक्षी गठबंधन के जातिगत कार्ड को निष्प्रभावी कर दिया है। यह संदेश दिया गया है कि भाजपा केवल सवर्णों की पार्टी नहीं है, बल्कि पिछड़ों को वास्तविक सत्ता सौंपने में विश्वास रखती है।

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