

Calcutta Stock Exchange Collapse Story: आज से ठीक एक साल पहले नीम के पेड़ के नीचे एक स्टॉक एक्सचेंज की शुरुआत हुई थी, जो एक स्कैम के कारण अब पूरी तरह बर्बाद हो चुका है। दरअसल, हम बात कर रहे हैं कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज (CSE) की, जो कभी शहर के लायंस रेंज से कारोबार करता था। एक समय यह बंगाल में उतना ही अहम था, जितना की आज के समय में मुंबई में दलाल स्ट्रीट की है।
लकड़ी के कारोबारी चिल्ला-चिल्ला कर बोलियां लगाते थे। उद्योगपति इसी जगह से चाय बागानों, जूट मिलों और शिपिंग कंपनियों के भविष्य तय करते थे। कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज काफी समय तक पूर्वी भारत का आर्थिक केंद्र रहा। लेकिन, आज हालात कुछ अलग है। अप्रैल 2013 के बाद से इस स्टॉक एक्सचेंज पर एक भी ट्रेड नहीं हुआ है।
हालांकि, पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद से ही कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज की चर्चा तेज फिर शुरू हो गई है। इसे फिर से पुनर्जीवित (Revive) करने की बात कही जा रही है। बंगाल विधानसभा में बजट भाषण के दौरान राज्य के वित्त मंत्री स्वपन दास गुप्ता ने कहा कि कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज को फिर से शुरू करने का सरकार समर्थन करेगी। इसे फिर से संचालित किया जाएगा, ताकि कोलकाता फिर से पूर्वी भारत का वित्तीय केंद्र बन सके।
अपने बजट भाषण में उन्होंने कहा कि कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज को फिर से ऑपरेट होने से ईस्ट इंडिया की कंपनियों को फंड जुटाने में आसानी होगी। राज्य सरकार ने यह भी तर्क दिया है कि इस स्टॉक एक्सचेंज को फिर से चालू होने से नए रोजगार पैदा होंगे और पश्चिम बंगाल की अर्थव्यवस्था को भी तेज रफ्तार मिलेगी।
हालांकि, अभी तो यह सिर्फ सरकार का प्रस्ताव है। असली सवाल यह है कि क्या कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज को फिर से खोला जा सकता है? सीधे तौर पर समझें तो इस स्टॉक एक्सचेंज को फिर से शुरू करने की प्रक्रिया आसान नहीं है। इसे समझने के लिए हमें कोलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज बैकग्राउंड को जानना होगा कि आखिर कभी देश की वित्तीय धड़कने रहने वाला CSE कैसे बर्बाद हो गई?
कोलकाता में स्टॉक ट्रेडिंग की शुरुआत 1830 के आसपास हुई थी, जब एक नीम के पेड़ के नीचे अनौपचारिक तरीके से स्टॉक बेचने और खरीदने का होता था। बड़ी संख्या में स्टॉक ब्रोकर इसी पेड़ के नीचे खुले में ट्रेड करते थे। धीर-धीरे इसका विस्तार होता गया और एक ऐसा समय आया जब सभी ब्रोकर संगठित हुए। फिर मई 1908 में कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज एसोसिएशन के नाम से एक संघ का गठन हुआ। कुल 150 सदस्यों वाले इस संगठना का मुख्यालय 2, चाइना स्ट्रीट में था।
इक्विटी कॉन्ट्रैक्ट एक्ट, 1956 के तहत भारत सरकार ने 14 अप्रैल, 1980 कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज को स्थायी मान्यता दिया था। लंबे समय तक इसने देश की सबसे अहम वित्तीय संस्थान के रूप में खुद को स्थापित किया। इसे एशिया के सबसे पुराने स्टॉक एक्सचेंज के रूप में जाना जाता था। एक समय यह भारत का दूसरा सबसे बड़ा स्टॉक एक्सचेंज था। लेकिन, एक स्कैम ने इसे पूरी तरह से बर्बाद कर दिया। वह बड़ा घोटाला था 2001 का केतन पारेख स्कैम।
साल 2001 में स्टॉक ब्रोकर केतन पारेख ने कुछ स्टॉक्स में बड़े पैमाने पर हेराफेरी किया। इसका नतीजा यह हुआ कि कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज पूरी तरह के क्रैश हो गया। केतन पारेख और उसके सहयोगियों ने एक्सचेंज की कुछ प्रमुख शेयरों की कीमतों में हेराफेरी की, जिससे पूरे सिस्टम में लिक्विडिटी की कमी आई और निवेशकों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा।
साल 1999 से 2001 के बीच केतन ने टेलीकॉम, आईटी और मीडिया सेक्टर के लगभग 10 शेयर को चुना। बाद में इन शेयरों को K-10 Stocks के नाम से जाना जाने लगा। केतन सहयोगियों के जरिए अधिक संख्या में इन शेयरों की खरीदारी करता था, फिर उसे बेच देता था। इसके जरिए उसने शेयरों की आर्टिफिशियल वाल्यूम को बढ़ा देता। जिसके बाद आम निवेशक भी इस शेयर पर पैसा लगाने लगे। इस ट्रेडिंग के लिए वह बैंकों से पैसा लेता था। खासकर Madhavpura Mercantile Cooperative Bank से नियमों के विरुद्ध जाकर बड़े लोन लिए। इसके अलावा कुछ अन्य बैंकों से भी भारी कर्ज लिए गए थे। इन पैसों का इस्तेमाल स्टॉक की हेराफेरी में किया जाता था।
मार्च 2001 में केंद्र सरकार ने जैसे ही अपना बजट पेश किया उसके बाद से ही मार्केट में गिरावट की सिलसिला तेज हो गई। इसी दौरान कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज भी काफी तेजी से नीचे की ओर लुढ़कने लगा, क्योंकि इसकी जड़े पहले ही कमजोर हो चुकी थीं। केतन पारेख के शेयर भी तेजी से कमजोर होने लगे। मार्केट की स्थिति को देखते हुए बैंक गिरवी रखे शेयरों के बदले कैश वापस मांगने लगे। फिर क्या था ब्रोकरों ने शेयर बेचना शुरू कर दिया और भारी बिकवाली हावी होने लगी।
कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज के भीतर यह स्कैम इतना बड़ा था कि CSE फिर दोबार इससे उबर नहीं पाया। साल 2005 से लेकर 2012 तक इस स्टॉक एक्सचेंज की डेली ट्रेडिंग टर्नओवर 90 फीसदी से अधिक गिर गई। इसके पीछे एक और बड़ा कारण यह था कि लिस्टेड कंपनियां धीरे-धीरे नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) की ओर खुद को शिफ्ट करने लगी। इसका असर यह हुआ कि सेबी ने कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज पर 2013 में ट्रेडिंग को पूरी तरह से बंद कर दिया।