मधुबन विधानसभा: भाजपा-राजद के बीच सीधी जंग, MY vs अगड़ा फैक्टर किसका बिगाड़ेगा खेल?

Bihar Assembly Eelctions: मधुबन विधानसभा सीट ने 2005 के बाद से अपना राजनीतिक रुख निर्णायक रूप से एनडीए गठबंधन की ओर मोड़ दिया है। जहां 2005 से लेकर 2020 तक बीजेपी- जदयू के कब्जे में है।
Madhuban Assembly Constituency
बिहार विधानसभा चुनाव 2025, (कॉन्सेप्ट फोटो)
Published on
Updated on

Madhuban Assembly Constituency: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में पूर्वी चंपारण जिले की मधुबन विधानसभा सीट एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के बीच सीधे और कड़े मुकाबले का केंद्र बन गई है। शिवहर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली यह सामान्य सीट, अपने कृषि-प्रधान चरित्र और बदलते राजनीतिक रुझानों के लिए जानी जाती है।

भाजपा के गढ़ में राणा रंधीर की हैट्रिक को चुनौती

मधुबन सीट ने 2005 के बाद से अपना राजनीतिक रुख निर्णायक रूप से एनडीए गठबंधन की ओर मोड़ दिया है। जहां 2005 और 2010 में जदयू ने जीत दर्ज की, वहीं पिछले दो चुनावों (2015 और 2020) में यह सीट भाजपा के खाते में गई है।भाजपा के राणा रंधीर लगातार दो बार से इस सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। भाजपा ने एक बार फिर राणा रंधीर पर भरोसा जताया है, जिनके सामने इस बार जीत की हैट्रिक लगाने की बड़ी चुनौती है। उनकी जीत क्षेत्र में भाजपा के बढ़ते जनाधार का प्रमाण रही है। वहीं, महागठबंधन की ओर से राजद ने संध्या रानी को टिकट दिया है। राजद के लिए यह सीट जीतना एनडीए के इस गढ़ में सेंध लगाने और अपने पारंपरिक आधार को मजबूत करने जैसा होगा। यह मुकाबला राणा रंधीर के व्यक्तिगत प्रभाव और भाजपा की संगठनात्मक शक्ति बनाम राजद के MY समीकरण (यादव-मुस्लिम) और एंटी-इनकंबेंसी फैक्टर की लड़ाई होगी।

CPI से राजद तक का सफर

मधुबन का राजनीतिक इतिहास कांग्रेस और वामपंथी दलों के मजबूत दबदबे से शुरू हुआ था। फिर वामपंथ का दबदबा देखने को मिला। 1962 में कांग्रेस की जीत के बाद, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) ने लगातार तीन बार (1967, 1969, 1972) जीत दर्ज कर क्षेत्र में अपनी गहरी जड़ें बनाई थीं। इसके बाद सीताराम सिंह का वर्चस्व दिखा। 1985 से 2000 तक, सीताराम सिंह ने जनता पार्टी और बाद में राजद के टिकट पर लगातार जीत हासिल कर इस क्षेत्र को अपनी राजनीतिक पहचान दी। वे मंत्री भी रहे और राजद के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया। हालांकि, 2005 के बाद यह सीट स्पष्ट रूप से एनडीए के पाले में चली गई है, जहां अब भाजपा मजबूत स्थिति में है।

कृषक और MY-ब्राह्मण फैक्टर

मधुबन सीट पर जातीय समीकरण जटिल हैं। इस सीट पर कृषक समुदाय (जो कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था के कारण महत्वपूर्ण हैं), यादव, ब्राह्मण और अल्पसंख्यक मतदाता संख्या में अधिक हैं, जो परिणाम तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं। यहां MY vs अगड़ा का कार्ड खेला जाता है। राजद MY फैक्टर पर निर्भर करेगी, जबकि भाजपा को ब्राह्मण सहित अगड़ी जातियों और एनडीए के अन्य वोट बैंक का समर्थन मिलने की उम्मीद है।

नए कारक: प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी से शिव शंकर राय मैदान में हैं, जिनकी उपस्थिति दोनों प्रमुख दलों के वोटों में सेंध लगाकर मुकाबले को और रोचक बना सकती है।

मधुबन क्षेत्र बिहार के मध्य गंगा मैदान का हिस्सा है, जहां जलजमाव जैसी स्थानीय समस्याएं भी चुनाव में मुद्दा बनती हैं। इस बार राणा रंधीर के सामने हैट्रिक लगाने की चुनौती है, जिससे यह सीट 2025 के सबसे महत्वपूर्ण मुकाबलों में से एक बन गई है।

Navbharat Live: Hindi News
navbharatlive.com