

Total Electric Cars Sold In India: भारत में इलेक्ट्रिक कारों का बाजार अब रफ्तार पकड़ चुका है। जहां साल 2020 में देशभर में सिर्फ 3,252 इलेक्ट्रिक कारें बिकी थीं, वहीं 2025 तक यह आंकड़ा बढ़कर करीब 1.7 लाख यूनिट तक पहुंच गया। लेकिन इस तेज़ ग्रोथ के बीच एक चौंकाने वाली सच्चाई सामने आती है देश में बिकने वाली हर 5 में से करीब 2 इलेक्ट्रिक कारें सिर्फ कुछ गिने-चुने राज्यों से आती हैं। आखिर ऐसा क्यों है? आइए पूरी तस्वीर समझते हैं।
पिछले 5 सालों के आंकड़ों पर नजर डालें तो कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु ने मिलकर भारत की कुल इलेक्ट्रिक कार बिक्री में 30 से 35 फीसदी की मजबूत हिस्सेदारी बनाए रखी है। यह बढ़त नई नहीं है। साल 2020 में, जब EV मार्केट शुरुआती दौर में था, तब भी इन तीन राज्यों की हिस्सेदारी करीब 38 फीसदी थी। जैसे-जैसे देश के अन्य हिस्सों में इलेक्ट्रिक कारें लोकप्रिय हुईं, साउथ इंडिया की हिस्सेदारी थोड़ी स्थिर होकर 31–33 फीसदी के आसपास बनी रही।
अगर टॉप परफॉर्मिंग राज्यों की बात करें तो महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरल मिलकर भारत के कुल चार-पहिया EV रजिस्ट्रेशन का करीब 40 फीसदी योगदान देते हैं। इससे साफ है कि EV अपनाने में ये राज्य बाकी देश से काफी आगे निकल चुके हैं।
साउथ इंडिया की इस बढ़त के पीछे सबसे बड़ा कारण वहां के शहरों की भौगोलिक बनावट और ड्राइविंग पैटर्न है। बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद जैसे शहरों में रोज़ाना का सफर आमतौर पर छोटा और तय रूट्स पर होता है। हाईवे ड्राइविंग कम और शहर के अंदर चलना ज्यादा होता है, जिससे EV यूजर्स की सबसे बड़ी चिंता रेंज एंग्जायटी काफी हद तक खत्म हो जाती है। केरल में शहर और कस्बे हाईवे के साथ लंबे स्ट्रेच में फैले हुए हैं, जिससे पूरा राज्य एक बड़े अर्बन ज़ोन जैसा लगता है और EV चलाना ज्यादा आसान हो जाता है।
दक्षिण भारत में चार्जिंग नेटवर्क भी तेजी से विकसित हुआ है। पब्लिक और प्राइवेट दोनों स्तरों पर चार्जिंग कॉरिडोर बने हैं, जिससे इंटर-सिटी ट्रैवल आसान हुआ है। खासकर बेंगलुरु में EV टैक्सी फ्लीट्स और टेक-सेवी शुरुआती ग्राहकों ने इलेक्ट्रिक कारों को तेजी से नॉर्मल बना दिया।
साउथ इंडिया में बड़ी संख्या में लोग सैलरी क्लास से हैं, जो तय दूरी और तय समय पर सफर करते हैं। अपार्टमेंट या इंडिपेंडेंट घरों में रहने के कारण घर पर चार्जिंग आसान हो जाती है। एक बार रात में चार्जिंग की आदत बन जाए, तो पब्लिक चार्जर पर निर्भरता काफी कम हो जाती है।
पहले जहां राज्य सरकार की सब्सिडी EV खरीद की बड़ी वजह थी, अब उसका असर कम होता जा रहा है। ज्यादातर राज्यों में सब्सिडी का फर्क सिर्फ ₹10,000 से ₹30,000 तक रह गया है। अब खरीदार ज्यादा ध्यान रोज़मर्रा की उपयोगिता, चार्जिंग सुविधा और कुल खर्च (Total Cost of Ownership) पर दे रहे हैं और इन्हीं पैमानों पर साउथ इंडिया आगे नजर आता है।
2024 में जहां चार-पहिया EV की हिस्सेदारी 2.4 फीसदी थी, वहीं 2025 में यह बढ़कर करीब 4 फीसदी हो गई। जैसे-जैसे टियर-2 और टियर-3 शहरों में चार्जिंग सुविधा बढ़ेगी और ₹10–25 लाख रेंज में ज्यादा EV विकल्प आएंगे, वैसे-वैसे उत्तर और पश्चिम भारत भी तेजी से आगे बढ़ेंगे। हालांकि फिलहाल, EV क्रांति की कमान साउथ इंडिया के हाथ में ही है।