
महमूद अब्बास, फोटो (सो.सोशल मीडिया)
Palestine News in Hindi: फिलिस्तीन की राजनीति में एक युगांतरकारी बदलाव की आहट सुनाई दे रही है। एक तरफ जहां अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ‘गाजा पीस बोर्ड’ के गठन की तैयारी की खबरें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल पैदा कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने एक बड़ा सियासी ऐलान कर दुनिया को चौंका दिया है। अब्बास ने घोषणा की है कि आगामी 1 नवंबर को फिलिस्तीनी नेशनल काउंसिल (PNC) के चुनाव आयोजित किए जाएंगे।
इस चुनाव की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक विशेषता इसकी मतदान प्रक्रिया है। अब तक PNC, जो कि फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन (PLO) की संसद मानी जाती है उनके सदस्यों का चयन केवल नियुक्ति या आपसी सहमति के आधार पर होता था। लेकिन राष्ट्रपति द्वारा जारी आधिकारिक आदेश के अनुसार, इतिहास में पहली बार इसके सदस्य सीधे जनता के वोट से चुने जाएंगे। यह आदेश सरकारी समाचार एजेंसी ‘वाफा’ के माध्यम से सार्वजनिक किया गया है।
PNC को लंबे समय से निर्वासित संसद के रूप में देखा जाता रहा है जो दुनिया भर में फैले फिलिस्तीनी नागरिकों की आवाज बनती है। राष्ट्रपति अब्बास ने स्पष्ट किया है कि ये चुनाव केवल फिलिस्तीनी क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहेंगे। जहां भी संभव होगा, फिलिस्तीन के अंदर और बाहर, दोनों जगह मतदान कराए जाएंगे ताकि वैश्विक फिलिस्तीनी समुदाय को अपने प्रतिनिधि चुनने का लोकतांत्रिक मौका मिल सके।
महमूद अब्बास वर्तमान में फिलिस्तीनी अथॉरिटी के राष्ट्रपति और PLO के प्रमुख दोनों भूमिकाओं में हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव PLO को फिर से सक्रिय और प्रासंगिक बनाने की उनकी एक बड़ी कोशिश है। हालांकि, इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया में एक बड़ी खामी यह है कि हमास और फिलिस्तीनियन इस्लामिक जिहाद जैसे प्रभावशाली संगठन इस परिषद का हिस्सा नहीं होंगे। चूंकि ये संगठन PLO के सदस्य नहीं हैं, इसलिए उन्हें PNC चुनाव में भी कोई प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा।
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फिलिस्तीनी राजनीति पर अब तक फतह पार्टी का वर्चस्व रहा है जिससे खुद महमूद अब्बास भी जुड़े हुए हैं। विशेषज्ञों का तर्क है कि सीधे चुनाव कराने से PNC को नई लोकतांत्रिक वैधता प्राप्त होगी और शासन में पारदर्शिता आएगी। हालांकि, हमास जैसे बड़े गुटों की गैर-मौजूदगी इस पूरी प्रक्रिया की सर्वसमावेशिता पर सवाल भी खड़े करती है। फिर भी गाजा को लेकर बढ़ती कूटनीतिक सक्रियता के बीच इसे फिलिस्तीन के भविष्य की दिशा तय करने वाला एक क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है।






