
शहबाज शरीफ, डोनाल्ड ट्रंप (सोर्स- सोशल मीडिया)
Pakistan Join Trump’s Board of Peace: पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ गाजा के लिए गठित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने के समझौते पर गुरुवार, 22 जनवरी को हस्ताक्षर किए। इस मौके पर पाकिस्तान समेत 19 देशों के नेता स्विट्जरलैंड के दावोस में आयोजित समारोह में ट्रंप के साथ मंच पर मौजूद रहे। शहबाज शरीफ ट्रंप के बगल में बैठकर मुस्कुराते नजर आए, लेकिन पाकिस्तान के अंदर इस कदम को लेकर विरोध और आलोचना तेज हो गई है।
‘बोर्ड ऑफ पीस’ की स्थापना गाजा में इजरायल के दो साल के युद्ध के बाद शांति की निगरानी के लिए की गई थी। हालांकि ट्रंप का दृष्टिकोण इससे कहीं बड़ा था। बोर्ड का चार्टर अंतरराष्ट्रीय संघर्षों को सुलझाने में व्यापक भूमिका निभाने की योजना का हिस्सा माना जा रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक, ट्रंप इस मंच को अपने तरीके से एक तरह की “संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद” बनाने के रूप में देख रहे हैं।
इमरान खान की पार्टी PTI के अध्यक्ष बैरिस्टर गोहर अली खान ने कहा कि प्रधानमंत्री ने बिना किसी परामर्श के बोर्ड में शामिल होकर असंतुलित कदम उठाया। उन्होंने पूछा कि क्या पाकिस्तान हमास को निरस्त्र करने में कोई भूमिका निभाएगा। गोहर ने कहा, “यदि यह संयुक्त राष्ट्र का कोई निकाय होता, तो सरकार अपने आप निर्णय ले सकती थी, लेकिन बोर्ड ऑफ पीस कोई आधिकारिक संयुक्त राष्ट्र संस्था नहीं है।”
PTI के अन्य नेता असद कैसर ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार ने संसद की सहमति या चर्चा के बिना इतना संवेदनशील निर्णय लिया। उनका कहना था कि सरकार को वैश्विक समुदाय को यह गलत संदेश देने से पहले संसद को शामिल करना चाहिए था कि पाकिस्तान में लोकतंत्र मौजूद है।
जेयूआई-एफ के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने बोर्ड में शामिल होने के खिलाफ चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि फिलिस्तीनियों की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार लोग बोर्ड में हैं। उनका कहना था, “ट्रंप से शांति की उम्मीद करना बिल्कुल बेकार है। गाजा पर बमबारी जारी है और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और नेतन्याहू बोर्ड में कंधे से कंधा मिलाकर बैठे होंगे।”
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संसद में बोलते हुए शहबाज शरीफ की पार्टी PMLN के नेता और संसदीय कार्य मंत्री डॉ. तारिक फजल चौधरी ने कहा कि पाकिस्तान का फिलिस्तीन मुद्दे पर रुख हमेशा स्पष्ट और सैद्धांतिक रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि बोर्ड में शामिल होने का निर्णय राष्ट्रीय हित और मुस्लिम उम्माह की सामूहिक प्राथमिकताओं को देखते हुए लिया गया है, न कि राजनीतिक विचारों के आधार पर।






