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अंग्रेजों ने बनाया गुलाम…आजादी के साथ मिली बदहाली, फिर कैसे ‘ग्लोबल सुपरपॉवर’ बन बैठा अमेरिका?
- Written By: अभिषेक सिंह
The Dollar Story: एक कहानी में बचपन में सुना था कि 'राजा की जान तोते में है' ठीक वैसा ही कुछ अमेरिका के साथ भी है। उसकी ताकत के पीछे भी कुछ ऐसा ही कारण है। वो कारण क्या है? उसकी कहानी क्या है?

कॉन्सेप्ट फोटो (AI जनरेटेड)
The America Story: जब से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल के लिए पद संभाला है, उनके कई मनमाने फैसलों ने पूरी दुनिया को प्रभावित किया है। चाहे वह बिना चेतावनी के टैरिफ लगाना हो, किसी देश पर हमला करने की धमकी देना हो या दुनिया के किसी भी कोने में युद्ध जैसे हालात पैदा करने का दावा करना हो, ट्रंप लगातार सुर्खियों में बने रहते हैं। आज वह खुद को दुनिया के सबसे शक्तिशाली नेताओं में से एक मानते हैं।
इससे सबके मन में यह सवाल उठता है कि राष्ट्रपति ट्रंप इतने मनमाने तरीके से काम कैसे कर पाते हैं? अमेरिका ‘ग्लोबल सुपरपॉवर’ कैसे बन गया? इतिहास में कुछ ऐसा जरूर हुआ होगा जिसने वैश्विक राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया। अंग्रेजों का गुलाम अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति कैसे बन गया?
अमेरिका की ताकत का राज क्या है?
एक कहानी में बचपन में सुना था कि ‘राजा की जान तोते में है’ ठीक वैसा ही कुछ अमेरिका के साथ भी है। उसकी ताकत के पीछे भी कुछ ऐसा ही कारण है। वो कारण क्या है? उसकी कहानी क्या है? कैसे अमेरिका दुनिया की महाशक्ति बन गया? चलिए जानते हैं इन सभी सवालों के जवाब…
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अंग्रेजों ने अमेरिका को बनाया गुलाम
यह कहानी तब शुरू होती है जब अमेरिका एक ब्रिटिश उपनिवेश था। 1607 में इंग्लैंड ने जेम्सटाउन में अपनी पहली स्थायी कॉलोनी स्थापित की। धीरे-धीरे 13 ब्रिटिश उपनिवेश बने, और उन पर ब्रिटिश सम्राट का शासन था। समय के साथ इंग्लैंड ने अमेरिका पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली।
विदेशियों ने किया सिक्के का प्रयोग
इस दौरान धार्मिक मतभेदों से परेशान यूरोप के कई लोग बेहतर जीवन की तलाश में अमेरिका आए। लेखक जेसन गुडविन ने अपनी किताब ग्रीनबैक: द ऑलमाइटी डॉलर एंड द इन्वेंशन ऑफ अमेरिका में बताया है कि ये लोग अपने साथ सोना और अंग्रेजी सिक्के लाए थे। शुरू में उन्होंने इन सिक्कों का इस्तेमाल खाना, पीना और जानवरों की खाल खरीदने के लिए किया, लेकिन जैसे-जैसे उनके सिक्के खत्म होते गए, स्थिति मुश्किल होती गई।
अंग्रेजों ने किया ‘वैम्पम’ का इस्तेमाल
पैसे की कमी के कारण वस्तु विनिमय प्रणाली यानी एक चीज़ के बदले दूसरी चीज़ का लेन-देन शुरू हुआ, लेकिन यह हमेशा काम नहीं करता था। फिर इन लोगों को वैम्पम नाम के खास सीपियों के बारे में पता चला, जिन्हें मूल अमेरिकी बहुत महत्व देते थे। अंग्रेजी बसने वालों ने खाने और दूसरी ज़रूरी चीज़ों के लिए व्यापार करने के लिए वैम्पम का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। उनका महत्व इतना बढ़ गया कि 1637 में, मैसाचुसेट्स कॉलोनी ने वैम्पम को कानूनी मुद्रा घोषित कर दिया।
अमेरिका कैसे बना सुपरपॉवर (इन्फोग्राफिक- AI जनरेटेड)
जैसे-जैसे व्यापार बढ़ा, वैम्पम के अलावा दूसरी चीज़ों का भी मुद्रा के रूप में इस्तेमाल होने लगा। उत्तरी उपनिवेशों में मक्का और कॉड मछली आम थी, जबकि दक्षिणी उपनिवेशों में तंबाकू प्रचलित था। लेकिन सब कुछ भरोसेमंद नहीं था। तंबाकू की कीमत फसल पर निर्भर करती थी और पत्तियां समय के साथ सूखकर खराब हो जाती थीं। लोग खराब पत्तियों से भुगतान करने लगे, जिससे व्यापार और भी बाधित हुआ।
साल 1776 में आजाद हुआ अमेरिका
इन सभी कठिनाइयों के बीच ब्रिटिश सरकार की नीतियों के प्रति असंतोष बढ़ता गया। आखिरकार, 1776 में अमेरिका ने आजादी की घोषणा कर दी और एक लंबी लड़ाई शुरू हो गई। 1783 में अमेरिका को अंग्रेजों से आज़ादी मिल गई, लेकिन युद्ध ने 13 अमेरिकी राज्यों को मुश्किल हालत में डाल दिया था।
युद्ध की वजह से हाल हो गया बेहाल
यह युद्ध इतना लंबा और महंगा था कि सरकार के पास सैनिकों को सैलरी, हथियार देने और कपड़े देने के लिए पैसे खत्म हो गए थे। मजबूरी में कॉन्टिनेंटल कांग्रेस ने कागज के नोट छापना शुरू कर दिया। इन नोटों से और बिना टैक्स लगाए अमेरिका ने एक बड़ी यूरोपीय शक्ति के खिलाफ युद्ध लड़ा। इन नोटों को ‘कॉन्टिनेंटल्स’ कहा जाता था, लेकिन युद्ध खत्म होने तक वे लगभग बेकार हो गए थे।
साल 1875 में हुआ ‘तोते’ का जन्म
अब सबसे बड़ी चुनौती एक नई आर्थिक व्यवस्था स्थापित करना था। 1785 में संयुक्त राज्य अमेरिका ने डॉलर को अपनी आधिकारिक मुद्रा घोषित किया। यह तय किया गया कि 1 डॉलर 100 सेंट के बराबर होगा। इसके बाद 1862 में गृह युद्ध के दौरान पहले डॉलर के नोट छापे गए। सामने से काले और पीछे से हरे इन नोटों को ग्रीनबैक कहा गया। यहीं से डॉलर की शक्ति में वृद्धि की शुरुआत हुई और धीरे-धीरे अमेरिका दुनिया में एक प्रमुख आर्थिक शक्ति बन गया।
पेट्रोडॉलर सिस्टम ने कर दिया कमाल
अमेरिका ने डॉलर की अपार शक्ति को समझा, लेकिन वह इसे अपने देश तक सीमित नहीं रखना चाहता था। लक्ष्य था कि सभी प्रमुख वैश्विक व्यापार डॉलर में ही किया जाए। इसी सोच से पेट्रोडॉलर सिस्टम का जन्म हुआ। पेट्रोडॉलर का मतलब है तेल बेचकर कमाए गए डॉलर। 1970 के दशक से दुनिया के अधिकांश तेल व्यापार डॉलर में होने लगे।
यह भी पढ़ें: ड्रग्स कॉर्टेल या तेल का खेल? ट्रंप का ‘मास्टरप्लान’ है वेनेजुएला पर अटैक, भारत के ऊपर भी भयानक संकट
इसका परिणाम यह हुआ कि हर देश को तेल खरीदने के लिए डॉलर की जरूरत थी और डॉलर की मांग कभी कम नहीं हुई। तेल उत्पादक देशों द्वारा जमा किए गए डॉलर को अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड में फिर से निवेश किया गया। इसे पेट्रोडॉलर रीसाइक्लिंग कहा गया। इससे अमेरिका को सस्ता क्रेडिट मिला और उसकी अर्थव्यवस्था और मज़बूत हुई।
सऊदी अरब के साथ बड़ा समझौता
1974 में अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने सऊदी अरब के साथ एक महत्वपूर्ण समझौता किया। यह सहमति बनी कि दुनिया का अधिकांश तेल विशेष रूप से डॉलर में बेचा जाएगा। इसके बदले में अमेरिका सऊदी अरब को सुरक्षा की गारंटी देगा। यह सौदा पेट्रोडॉलर सिस्टम में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी साबित हुआ।
जिसने दी चुनौती, उसका हुआ बुरा हाल
कई देशों ने डॉलर की शक्ति को चुनौती देने की कोशिश की है। 2018 में वेनेजुएला ने घोषणा की कि वह अपना तेल डॉलर में नहीं, बल्कि युआन, यूरो और रूबल में बेचेगा। अमेरिका को डर था कि अगर वेनेजुएला सफल हो गया, तो दूसरे देश भी ऐसा ही करेंगे।
सद्दाम को फांसी-गद्दाफी की हत्या
इतिहास बताता है कि अमेरिका ने ऐसे चुनौती देने वालों को सबक सिखाया है। इराक के सद्दाम हुसैन ने तेल यूरो में बेचने की बात की थी, लेकिन 2003 में अमेरिका ने इराक पर हमला किया और सद्दाम को फांसी दे दी गई। लीबिया के गद्दाफी ने सोने पर आधारित मुद्रा, “गोल्ड दीनार” का विचार पेश किया, लेकिन 2011 में नाटो के हमले में उनकी हत्या कर दी गई।
धीरे-धीरे बदल रहे वैश्विक समीकरण
अब धीरे-धीरे स्थिति बदल रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रूस ने तेल व्यापार में रूबल और युआन का इस्तेमाल बढ़ा दिया है। ईरान पहले से ही नॉन-डॉलर करेंसी में तेल बेच रहा है। यही वजह है कि ट्रंप खामेनेई से भी चिढ़े रहते हैं। इसके चीन ने अपना खुद का पेमेंट सिस्टम डेवलप किया है जो हजारों बैंकों से जुड़ा हुआ है।
क्या बरकरार रहेगी अमेरिकी ताकत?
हालांकि डॉलर की ताकत और ट्रंप की एकतरफा नीतियों की वजह से अभी अमेरिका ग्लोबल मामलों में सबसे आगे हो सकता है, लेकिन आने वाले सालों में तस्वीर बदल सकती है। अगर डॉलर का कोई मजबूत विकल्प सामने आता है, तो ग्लोबल राजनीति और इकोनॉमी की पूरी तस्वीर बदल जाएगी और ट्रंप का ऐसा ही अड़ियल रवैया बरकरार रहा तो यह बहुत जल्द हो सकता है।
Frequently Asked Questions
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Que: अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति कैसे बना?
Ans: अमेरिका की ताकत का आधार उसकी आर्थिक व्यवस्था और डॉलर की वैश्विक स्वीकार्यता है। आज़ादी के बाद डॉलर को राष्ट्रीय मुद्रा बनाया गया और बाद में पेट्रोडॉलर सिस्टम के जरिए तेल जैसे अहम वैश्विक व्यापार को डॉलर से जोड़ दिया गया, जिससे अमेरिका की आर्थिक और राजनीतिक शक्ति लगातार बढ़ती गई।
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Que: पेट्रोडॉलर सिस्टम क्या है और इससे अमेरिका को क्या फायदा हुआ?
Ans: पेट्रोडॉलर सिस्टम वह व्यवस्था है जिसमें वैश्विक तेल व्यापार मुख्य रूप से अमेरिकी डॉलर में होता है। इससे हर देश को तेल खरीदने के लिए डॉलर की जरूरत पड़ती है, डॉलर की मांग बनी रहती है और अमेरिका को सस्ता कर्ज, मजबूत अर्थव्यवस्था और वैश्विक प्रभाव मिलता है।
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Que: क्या डॉलर की वैश्विक ताकत को चुनौती मिल रही है?
Ans: हां, रूस, ईरान, चीन और कुछ अन्य देश तेल और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर के बजाय अपनी या वैकल्पिक मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं। अगर भविष्य में डॉलर का कोई मजबूत विकल्प उभरता है, तो अमेरिका की वैश्विक ताकत और उसकी एकतरफा नीतियों पर बड़ा असर पड़ सकता है।
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