क्या सद्दाम हुसैन जैसा होगा निकोलस मादुरो का अंत? डोनाल्ड ट्रंप की कार्रवाई से दहल उठी दुनिया

US Strikes Venezuela: जंजीरों में बंद वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो की तस्वीर ने सद्दाम हुसैन की याद ताजा कर दी; क्या अंतर्राष्ट्रीय कानून अब केवल शक्तिशाली देशों की सनक का गुलाम बनकर रह गया है?
US Venezuela Conflict
सद्दाम हुसैन, निकोलस मादुरो (सोर्स- सोशल मीडिया)
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US Venezuela Conflict: क्या आपने अमेरिकी स्पेशल फोर्स के जवानों की गिरफ्त में जंजीरों में जकड़े वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की वह तस्वीर देखी है? यह दृश्य अनायास ही दिसंबर 2003 की उस दर्दनाक याद को ताजा कर देता है जब इराक के तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को इसी तरह हतप्रभ और हताश अवस्था में दुनिया के सामने पेश किया गया था।

मादुरो भी सद्दाम की तरह एक संप्रभु देश के निर्वाचित राष्ट्रपति हैं। सवाल यह उठता है कि क्या अंतर्राष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र अब अमेरिकी हुक्मरानों की सनक के गुलाम बन चुके हैं? पूर्व में जॉर्ज डब्ल्यू बुश सद्दाम पर लगाए आरोपों को साबित नहीं कर पाए थे, और अब आशंका है कि मादुरो इसी 'झूठ की परंपरा' की अगली कड़ी बनने जा रहे हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति का 'न्यू ईयर सरप्राइज'

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड जे. ट्रंप ने साल 2026 के पहले ही हफ्ते में दुनिया को युद्ध की एक डरावनी सौगात दी है। दशकों बाद किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने साल की शुरुआत इतनी आक्रामक वारदात से की है। मादुरो की गिरफ्तारी केवल एक देश की घटना नहीं है, बल्कि यह एक खतरनाक मिसाल है। इसका असर रूस-यूक्रेन युद्ध पर भी दिख सकता है, जहां व्लादिमीर पुतिन भी अपने यूक्रेनियाई समकक्ष वोलोदिमीर जेलेंस्की को गिरफ्तार करने की मंशा पाले हुए हैं। मॉस्को द्वारा हाल ही में जारी दावों के बाद, जहां पुतिन के आवास पर ड्रोन हमले की बात कही गई, यह अंदेशा गहरा गया है कि कराकस जैसी घटना जल्द ही कीव में भी दोहराई जा सकती है।

मादुरो पर नशे की तस्करी से आतंकियों से संबंध के आरोप

अमेरिका ने वेनेजुएला पर हमला इस आधार पर किया कि वहां के राष्ट्रपति नशीले पदार्थों के तस्करों और आतंकियों को पनाह देते हैं। विडंबना देखिए कि वही अमेरिका पाकिस्तान जैसे देशों की अनदेखी करता रहा है, जो ओसामा बिन लादेन से लेकर अजहर मसूद तक को पालने में माहिर हैं। दूसरी ओर, पुतिन ने जेलेंस्की को 'फासिस्ट' बताकर अपने हमलों को जायज ठहराया। दुनिया की मौजूदा अशांति इन्हीं असत्यों और कुतर्कों की देन है, जहाँ ताकतवर देश अपनी मर्जी के अनुसार 'आतंक' और 'न्याय' की परिभाषा तय कर रहे हैं।

ग्लोबल पीस इंडेक्स: जलती हुई दुनिया का आईना

'ग्लोबल पीस इंडेक्स' (जीपीआई) की ताजा रिपोर्ट एक भयावह तस्वीर पेश करती है। संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों में से 78 इस समय किसी न किसी रूप में जंग की आग में झुलस रहे हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह पहला अवसर है जब इतनी बड़ी संख्या में संप्रभु राष्ट्र आमने-सामने हैं।  साल 2025 में ही 17 देशों के एक हजार से अधिक नागरिक युद्ध की भेंट चढ़ चुके हैं। अब शांति के टापू कहे जाने वाले थाईलैंड और कंबोडिया जैसे देश भी आपस में टकरा रहे हैं। हथियारों की होड़ इस कदर बढ़ गई है कि विश्व की जीडीपी का 11.6 प्रतिशत हिस्सा केवल रक्षा व्यय पर खर्च हो रहा है, जिससे वैश्विक विकास और कल्याणकारी योजनाएं ठप पड़ रही हैं।

यूरोप के दरवाजे पर खड़ी रूस-यूक्रेन युद्ध

रूस-यूक्रेन जंग अब अपने चौथे साल में प्रवेश कर चुकी है। 53 हजार से अधिक मौतें और एक करोड़ से ज्यादा विस्थापितों के साथ इस युद्ध ने यूरोप के सुकून को छीन लिया है। डेनमार्क और स्वीडन जैसे देश, जो दशकों से शांत थे, अब युद्धकालीन सुरंगों की सफाई कर रहे हैं और नए हथियारों की खरीद में जुटे हैं। डोनाल्ड ट्रंप द्वारा नाटो देशों से अधिक रक्षा शुल्क की मांग ने यूरोपीय अर्थव्यवस्था को और अधिक सैन्यीकरण की ओर धकेल दिया है। 1991 से 2019 के बीच जो विकास की गाथा लिखी गई थी, वह अब अतीत की धूल बनती नजर आ रही है।

भारत में दो मोर्चों पर युद्ध की आहट

भारत भी इस वैश्विक अस्थिरता से अछूता नहीं है। सैन्य प्रशासन 'ऑपरेशन सिंदूर 2.0' जैसी आशंकाओं के बीच बड़ी जंग की तैयारी पर मजबूर है। एक ओर पाकिस्तान की नापाक हरकतें हैं, तो दूसरी ओर चीन जैसा शक्तिशाली और शत्रुतापूर्ण पड़ोसी।

पूर्व सीडीएस जनरल बिपिन रावत ने हमें 'टू-फ्रंट वार' के लिए तैयार रहने की सलाह दी थी, जो आज के परिप्रेक्ष्य में और भी सटीक बैठती है। इसके अतिरिक्त, बांग्लादेश में इस्लामाबाद और बीजिंग समर्थित अस्थिरता ने भारत के लिए नई सुरक्षा चिंताएं पैदा कर दी हैं। वहां छात्र नेताओं की हत्याएं और बढ़ता भारत-विरोध किसी गहरी साजिश का संकेत है। 

साल 2025 की विरासत ने 2026 के सामने युद्धों और अविश्वास की एक लंबी दीवार खड़ी कर दी है। क्या मानवता के पास अब भी शांति के सूत्र खोजने की कुव्वत बची है, या फिर यह धरती विनाशकारी हथियारों के बोझ तले ही दफन हो जाएगी?

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